Sunday, November 29, 2009

Maaf kijiyega...

यहाँ पहले माँ को समर्पित एक रचना थी ... जिसे सम्पूर्ण विश्व का परम स्नेह मिला ....लेकिन कुछ वरिष्ठ लोगों की सलाह पर उसे यहाँ से हटा दिया है… जिससे कम-से-कम ये रचना तो किसी दुरूपयोग का शिकार न हो पाये. 

दुरूपयोग करने वालों को ईश्वर अपना रचनात्मक-आशीर्वाद दे और इतनी प्रतिभा भी कि वो खुद .....
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आपका नीलेश

4 जुलाई 2 0 1 3
मुंबई


Thursday, November 12, 2009

मेरा ख़ुदा रहे सलामत मुझे मस्ज़िदों से क्या !!!

कई बार हम टूटने लगते हैं ... बिखरने के कगार पर आ खड़े होते हैं ... और कारण होता है, उन बे-वज़ह की बातों को जरूरत से ज़्यादा अहमियत दे देना, जो इसलिए अहम बन पड़ती हैं क्योँकि हमने उन्हें अहम मान लिया होता है। सच तो ये होता है कि हम मंजिल से निगाह हटा रहे होते हैं या उन मशवरों पर गौर करने लगते हैं जो गौर करने लायक नहीं होते या फिर उन उँगलियों को अपने ऊपर उठा मान कर ख़ुद को कमज़ोर समझने लगते हैं, जो कभी ख़ुद पर उठी हीं नहीं। ऐसे में एक सलाह है कि अगर ऐसा कुछ भी सफर के दरमियाँ आये ... तो उसे दरमियाँ ही छोड़ दें ...और बस मंजिल पर निगाह रखें और ख़ुद को समझाएं कि :

मेरी मंजिल रहे सलामत
मुझे रास्तों से क्या !
मेरा खुदा रहे सलामत,
मुझे मस्ज़िदों से क्या !!



Wednesday, November 4, 2009

वो दरख्त खो गए हम जिनकी शाख थे !


जो मैंने खोया ...
वो उसने भी खोया है ...
मेरी तरह वो भी बहुत रोया है ...
वो 'बड़ा' होकर भी मेरे छोटे भाई जैसा ही है ...
उस दिन लगा सब कुछ वैसा ही है ...

फर्क तो बस होता है जीते हुए इंसानों में
पर वो भी मिट जाता है आंसूं और श्मशानों में
नहीं तो भला क्या फर्क था उस दिन
उस आखिरी सफ़ेद लिबास में ...
उनके ठंडे पड़ चुके सर्द एहसास में ...
राम के नाम या चिता की तपन आग में ...
हमारी आँख की नमी या फिर 'राख' हो चुकी राख में ...
या उनके लिए कुछ कम कर पाने के गहरे पश्चाताप में ...
तब समझ आया बनता है नया रिश्ता दुःख की तपती आंच में !


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सादर नमन !
मौन शब्द- श्रद्धांजलि !!

नीलेश , मुंबई

Tuesday, November 3, 2009

नदी पानी से नहीं बहने से बनती है

होती रही गलती
कितनी बीती तारीखें
कितनी गुजरीं सदी
कहलाता रहा
ठहरा पानी तालाब
गिरता झरना
और बहता नदी
फिर भी हमने समझ लिया
पानी को नदी !
दरअसल
नदी पानी का नहीं बहने का नाम है
ऊंचाइयों से नीचे उतरते रहने का नाम है
बहते-बहते ... देते-देते गुजरने का नाम है
ये कुदरत का है एक सबक जो इंसानियत के नाम है


आपका नीलेश
मुंबई

Thursday, October 29, 2009

कुदरत भी एक किताब है !

कहते हैं कि बनानेवाले ने कुछ भी बे-वज़ह नहीं बनाया। अगर ऐसा है तो फिर क्यों न एक आदत डाली जाए ... इस पूरी कायनात को - इस कुदरत को एक किताब मान लिया जाए और फिर उसके गहरे मायनों को खोजा जाए ... इसी तलाश में लगा कि बनानेवाले ने इस ज़मी की 'ज़मी' को भी अज़ब बनाया है ...जो कभी साथ नहीं हो सकते उन्हें एक साथ रखा है - पानी और आग को ! ... तो क्या ये उसका अपना कोई तरीका है इंसान तक अपना फलसफा पहुंचाने का ...यही सोचते-सोचते ये ख्याल आया :

इस ज़मी में छुपा एक फलसफा यूँ तो साफ़ भी है ...

पर दिखेगा उसको ही जिसके पास 'वो आँख' भी है ...

जिसमें इस बेपनाह गहराई में जाने की पाँख भी है ...

कि जिस ज़मी के अन्दर आब* है उसी में आग भी है ...

~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~~

* पानी

आपका नीलेश

मुंबई

Tuesday, October 27, 2009

आज के लिए कुछ ख़ास !

बेचैनी की
अजब-सी लगी है आग
उसको बुझाइए ....

एक कतरा
सुकूं के समंदर से
लेके आइए...

जो है, जितना है
उतना
बहुत है
ये जज़्बा जगाइए...

खुशी कभी ख़ुद से बाहर नहीं
ये सोच कर ढूँढिये
और ख़ुद में पाइए ...

बाकी सब है दुनियावी
पर ये रूहानी बात है
इसमें दलील को
इतना लगाइए ...

ये परखा हुआ नुस्खा है
फकीरों का
आप भी जरा
इसको आजमाइए !


आपका नीलेश
मुंबई

Saturday, October 24, 2009

विगत के प्रति कृतज्ञ होना सीखो!

आज एक समस्या है ... है भी या नहीं ... या फिर एक नकारात्मक अनुमान मात्र है ... ये निर्भर करता है सबके अपने-अपने सामाजिक अनुभव या निजी अनुभूति पर - और वो समस्या यह है कि आज की पीढ़ी विगत को महत्व नहीं देती ... या देना नहीं चाहती ... वो आज की उपलब्धि के लिए विगत पीढ़ी को वर्तमान की 'वर्तमान' परिस्थिति के लिए कोई भी; कितना भी या फिर कुछ भी महत्व नहीं देना चाहती। इसके पीछे मूल भाव ये सक्रिय दीखता है कि आज की पीढ़ी की दृष्टि में ...जो गत युग बीता है वो पुरातन था ... आधुनिकता से रीता था । तकनीकी तो थी परन्तु प्रौद्यागिकी नहीं। प्रौद्यागिकी आज मनुष्य-को-मनुष्य से जोड़ तो रही है परन्तु संबंधों का ये नवीन समाजशास्त्र संचार की उपयोगिता को 'कार्य सिद्धि के साधन मात्र' रूप में ही देखता है; मानवीय सद्-भावना के सेतु के रूप में नहीं। इसीलिए प्रौद्यागिकी ने उन लोगों को तो पास लाया जो दूर थे; पर वो दूर होने लगे जो पास थे। हमने दूरस्थ से तो संवाद साधना सीख लिया परन्तु निकटस्थ से नहीं। यहीं नयी पीढ़ी में एहसास-ए -बेहतरी का निरर्थक भाव जागा ... उन्हें लगा कि विगत पीढ़ी नयी सीख के लिए हम पर नितांत निर्भर है ... हमे विज्ञानं का अधिक उपयोग आता है... यहीं उनसे मूल की भूल हुयी ... वे भूल गए कि आज जिस का प्रयोग कर वो अपने को आधुनिक और प्रगतिशील मान रहे हैं, उसकी नींव में यही विगत पीढ़ी है। इसीलिए उन्हें विगत के प्रति कृतज्ञ होना सीखना होगा और साथ ही यह भी समझना होगा कि :

'कंप्यूटर तक हम बिना कंप्यूटर के ही पहुंचे हैं। '

आपका नीलेश
मुंबई

Tuesday, October 20, 2009

दीपावली के निहितार्थ

दीपावली अर्थात् दीपों की अवली ... एक दीप नहीं अनेक दीपों का एक पंक्तिबद्ध होना ... एक साथ जगमग होना। ये एक संदेश है, उस देश को जहाँ यदि अपने आप में 'एक दीप' होने का भी प्रबुद्ध-संदेश दिया गया तो साथ ही सबके साथ होने का भी। इन अर्थों में यह पर्व भारत की सामासिक संस्कृति का प्रतीक पर्व भी बन जाता है।
लक्ष्य के प्रतीक के रूप में 'लक्ष्मी' की पूजा-अर्चना का विधान किया गया तो ईश के गण के रूप में - मुखिया के रूप में 'गणेश' का भी अर्थात् लक्ष्य को लक्षित करो और साथ ही जो सर्वप्रमुख है - मुख्य है, उसे सदैव प्राथमिकता दो ।
शुभ-लाभ भी कहा गया अर्थात यह शुद्ध भाव भी रखा गया कि लाभ तो हो परन्तु हो शुभ। यूँ तो लाभ को सदैव दूसरे की हानि के रूप में ही देखा जाता है परन्तु 'शुभ-लाभ' की संकल्पना का निहितार्थ है ...यथोचित लाभ ... उतना लाभ जितना जीवनोपार्जन के लिए - जीवकोपार्जन के लिए उचित हो ... जो सम्पोषणीय हो ... सेवा अथवा वस्तु की उपलब्धता हेतु - सेवार्थ आवश्यक हो; किसी की मजबूरी अथवा विवशता के नाम पर जो शोषणकारी न हो।
स्वच्छता को लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रथम माना गया ... समस्त आंतरिक मलिनता को साफ़ किए बगैर लक्ष्य की प्राप्ति असंभव है ... यहाँ मार्ग की शुद्धता का चिरंतन मूल्य भी सुनिश्चित किया गया ... सच है जब तक अंत:गृह में निरर्थक की उपस्थिति रहेगी तो सार्थक के लिए स्थान ही कहाँ उपलब्ध हो सकेगा!
इसे 'नव वर्ष' भी माना गया ... परन्तु यह उसी के लिए नव वर्ष है जिसने इन निहितार्थों को समझ लिया ...

आपके जीवन में भी
एक ऐसी दीपावली आए ...
एकमत सब दीप जलें
और नव वर्ष हर्षाए
!!!

आपका नीलेश

Wednesday, October 7, 2009

हद की सरहद से निकलना ही होगा....

अब हर हद की सरहद से निकलना ही होगा
मैं जानता हूँ हर हाल में मुझे चलना ही होगा

माना अब कोई नाखुदा नहीं
फिर भी अभी वो जुदा नहीं
ये एहसास दिल से आज भी करना ही होगा
मैं जानता हूँ हर हाल में मुझे चलना ही होगा

माना अब नहीं कोई आईना
मेरी सूरत के लिए
फिर भी मुझे औरौं के लिए सँवरना ही होगा
मैं जानता हूँ हर हाल में मुझे चलना ही होगा

माना अब कोई तराजू नहीं
मेरे ईमान की खातिर
फिर भी अपने ज़मीर के लिए तुलना ही होगा
मैं जानता हूँ हर हाल में मुझे चलना ही होगा

आपका नीलेश

Friday, September 25, 2009

... मृत्यु सदैव मौत नहीं होती ...

बहुत दिनों के बाद लिख रहा हूँ ... लिख पा रहा हूँ... इतने दिनों मानस-गुफा में स्वयं को साध रहा था...और स्वयं सध भी रहा था ... समय कठिन था ... कठिनतर था ... कठिनतम था ...पर गुजर गया ... पर उसके साथ ही गुजर गया वो भी ...जन्म दिया जिसने वो कहीं चला गया.... वो चला गया जिसके होने से मेरा होना है ... वो नहीं है फिर भी आज मुझे होना है ... यही जीवन का परम सत्य भी है और चरम अपेक्षा भी!

राम नाम सत्य है ... ये हम आख़िर किससे कहते हैं ? ... किसके लिए कहते हैं?? वो जो निर्जीव है अथवा जो सजीव है? ये प्रश्न अब समझ आया ... और साथ ही उत्तर भी कि ये संदेश है सजीव को ... जीवन को नित्य बनाने का ... बनाये रखने का ... क्योंकि राम तो वही है जो सब में रमा हुआ है ... समाया है ... और जो सब में है ... रहा है ... वो नश्वर कैसे हो सकता है ... इसीलिए वो सत्य है ... चिरंतर है ... निरंतर है ...!! जब इस सत्य को स्मृत रखा जाएगा तो मृत्यु मौत नहीं लगेगी ... जीवन का अंत नही लगेगी .... अनंत लगेगी ... वो जीवन का अन्तिम उत्सव बन जायेगी ... तब हम उसे सहर्ष स्वीकार कर पायेंगे और शांत मन से कह पायेंगे :

जीवन के हर ऋण को चुकाती है...
मृत्यु मुक्ति बन कर आती है !!!
...

आपका नीलेश
मुंबई

Friday, August 28, 2009

गंगा को पाना है ...तो गोमुख जाना ही होगा !

हम समझते हैं कि गंगा को हम हरिद्वार में पा सकते हैं ; प्रयाग की त्रिवेणी में या फिर उससे भी आगे ... गंगा यहाँ एक प्रतीक है - हमारे प्रयासों का। ये खोज - ये गवेषणा किसी की भी हो सकती है ... किसी के लिए भी हो सकती है। मूल बात ये है कि ऐसा समझना अपनी भूल है कि हम किसी को उसके मूल से दूर जाकर पा सकते हैं ... मेरी निगाह में यही 'मूल की भूल' है । इसके लिए ये अपरिहार्य है कि हम धारा के विरुद्ध जाना सीखें। ये कार्य आसान नहीं है ... पहले तो इसको समझना और फिर उस समझ को अमल में लाना क्योंकि ...

धारा के विरुद्ध ही 'तैरना' होता है;

धारा
के साथ तो 'बहना' होता है...

बह
तो निष्प्राण भी सकते हैं;

परन्तु
तैर सिर्फ़ चेतन ही सकते है !


आपका नीलेश

Tuesday, August 25, 2009

ईश्वर की उपस्थिति में भी महाभारत क्यों?

यदि ऊपरवाले को अंतत: सब कुछ सही ही करना होता है, तो फिर विपत्ति क्योंकर आती है? ये सवाल सब के मन में उठता रहा है। यदि पांडव जीतने ही थे और सब कुछ पूर्व विदित एवं निश्चित ही था... तो फिर महाभारत हुआ ही क्यों? यदि स्वयं कृष्ण वहां उपस्थित थे, तो फिर अर्जुन भटके कैसे ... असमंजस की स्थिति कैसे जन्मी ??? प्रश्न अनेक हैं परन्तु उत्तर एक है कि जब तक परिस्थितियां अपने चरम पर नहीं पहुँच जाती तब तक वो मनोस्थिति बन ही नहीं पाती है कि कोई किसी मूल बात को समझ सके। संभवत: जब भी परिस्थितियां प्रतिकूल बनती हैं तो उन्हें ईश्वरीय विधान मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए ... इस आशा के साथ कि अवश्य ही कुछ अमूल्य -- अभूतपूर्व घटित होने को है... कोई जीवनामृत इन विष-मयी परिस्थितियौं से ... इस गहन मंथन से जन्म लेने वाला है ... क्योंकि ...

द्वंद्व में ही गीता जन्मती है !

आपका neelesh

Monday, August 24, 2009

दुख का भविष्य; सुख के भविष्य से अधिक सुखकर होता है!

कुछ दिनों से कुछ लिख नहीं पाया क्योंकि जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा था । एक तरफ़ जीवन देने वाले का जीवन था, तो दूसरी तरफ़ ईश्वर पर विश्वास की दो तरफा परीक्षा चल रही थी । दो तरफा इसलिए क्योंकि मुझे परीक्षा देनी थी और किसी को अपना सनातन अस्तित्व सिद्ध करना था । आख़िर में दोनों ही सफल रहे। इस समयावधि में कई बार स्वयं को टूटने के कगार पर पाया ... पर हर बार स्वयं को समझाया कि समय अच्छा आएगा... ये तो परिवर्तन का नियम है ...क्योंकि

परिवर्तन ही स्थायी है;शेष तो परिवर्तनशील होता है!

आपका नीलेश
२४-०८-०९

Monday, August 10, 2009

एक के प्रति अग्र होना ही ,'एकाग्र' होना है !

सृजनात्मक व्यक्तित्व अक्सर ये अनुभूत करते हैं कि उनकी एकाग्रता का स्तर अपेक्षित स्तर से कम है । वे इसे सृजन के मार्ग में बाधा भी मान लेते हैं। जिसे हम एकाग्रता की न्यूनता मानते हैं, दरअसल वो ही इस ओर एक इशारा है कि हम कुछ नया -- नवीन -- नूतन प्रस्तुत करने जा रहे हैं; चूंकि वो अदृश्य -- अभूतपूर्व निर्माण होता है, इसीलिए वो स्पष्ट नहीं होता है ... और हमे लगता है कि हम एकाग्रता के अभाव में उसे देख नही पा रहे हैं... वो हमे अप्राप्य हैइसीलिए देखा जाए तो एकाग्रता की अपेक्षा इतनी ही होती है कि जब आप कोई कार्य करें तो अपनी समस्त समर्थता का उसमें सम्पूर्ण निवेश कर दें । सत्य तो ये है कि प्रश्न एकाग्रता की कमी का नहीं हैं क्योंकि यदि कोई; कुछ; कैसा भी पूर्व निर्धारित होगा तभी तो ये सम्भव है कि हम उसके प्रति एकाग्र हो पाएं । पूर्व निर्धारित होना तो सृजनात्मक प्रक्रिया में सम्भव नहीं है क्योंकि :

सृजन के प्रमाण नहीं होते !

नीलेश
मुंबई

... क्या हम आज से पहले भी थे ! ? !

कभी हमें लगता है कि हम आज से पहले भी थे...ज़िन्दगी में कई अघटित बातें भी जानी-पहचानी सी लगती हैं ... कभी कोई अनजाना चेहरा ... कभी कोई जगह ... सब कुछ जैसे कुछ याद दिलाता है । फिर एक अजब सी बेचैनी हमें झकझोरने लगती है । स्वयं पर ही प्रश्न उठने लगते हैं ... हम उठाने लगते हैं ... पर किसके पास है इसका उत्तर! सिर्फ़ वही इसे स्वीकार कर सकते हैं, जो 'आत्मा' में विश्वास करते हैं और मानते हैं कि आत्मा सभी में होती है । जब हम उसके प्रति चेतन हो जाते हैं; तो वो हमारी मार्ग दर्शक बन जाती है, ऐसे व्यक्ति ही 'आत्म चेतन स्वरुप ' होते हैं । तब सद् विचारों को व्यक्ति स्वयं ही पाने लगता है चूंकि ये उस अंतरात्मा की आवाज़ होती है, जो कभी ग़लत मार्ग नहीं दिखाती । ये चेतना की प्रथम अवस्था होती है... जिसमें हम स्वयं को पहचानना सीखते हैं। इसे ही संभवत: 'आत्म साक्षात्कार' की अवस्था कहते हैं। इसी अवस्था में बेचैनी होती है, हम अपने पूर्व जीवन के बारें में जानना चाहते हैं । मान लो हम जान भी जाएँ तो पश्चगमन तो सम्भव नहीं ही है अतः ये स्वीकार कर लेना ही सर्वोचित होगा कि हम एक ऐसी अवस्था को प्राप्त हो गयें है ... जिसमें हमारे पदचिह्न शेष नहीं रहते; रहतें हैं तो सिर्फ़ आगामी मार्ग ... ऐसे मार्ग जिनसे हम उससे ऊपर के चरण में प्रवेश करते हैं ... आत्मा से महात्मा बनने के चरण में। मेरा मानना ये है कि 'महान' वो है जो समकालीन युग की अपेक्षा की पूर्ति करता है; और 'महात्मा' वो है जो सर्वार्थ हेतु युगों से परे -- युगातीत प्रयास करता है और लोगों को आत्मिक विकास के सूत्र प्रदान करता है। इससे परे भी एक परम अवस्था है -- परमात्मा की अवस्था । यहाँ अभी तक के लिए ये प्रश्न उठाना पर्याप्त होगा कि :

यदि महात्मा अपने में पूर्ण होते हैं;
तो
फिर परमात्मा क्या और क्यों ?

आपका नीलेश
मुंबई

Friday, August 7, 2009

परिभाषा नहीं जानता; परन्तु परिभाषित कर रहा हूँ!

'अपरिग्रह' को आज के सन्दर्भ में कैसे समझ सकते हैं ?
संभवत: इस प्रश्न के प्रश्नकर्ता की अपेक्षा शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं है । शास्त्रीय परिभाषा तो जानना मैं भी नहीं चाहता; परन्तु नये रूप में परिभाषित कर रहा हूँ, इस आशा के साथ कि शायद इस रूप में ये अधिक जीवनोपयोगी हो सके । इस तरह के प्रश्न नवीन सहज एवं सुबोध रूप में ही समझाये जाने की युगीन अपेक्षा रखते है ।
आओ अब समझें ... 'ग्रह' को केन्द्र भी कह सकते हैं; क्योंकि ये गोल होता है और 'परि' को परिधि का संक्षिप्त रूप मान लें । तो बात ये समझ में आ सकती है कि जब हम स्वयं को ही केन्द्र मानकर परिधि खींचना शुरू कर देते हैं, तो हम 'परिग्रही' हो जाते हैं ...तब हम स्वयं से परे नहीं सोच पाते, तब वो परिधि हमे सीमित कर देती है ... अपने तक समेट देती है ... ऐसे में हम स्वार्थी हो जाते हैं ... और तब हम सब अपने लिए ही संचित कर लेना चाहते हैं... संचित करने के प्रयास में हम संकुचित एवं संकीर्ण हो जाते हैं । इससे हम दूसरों को उनके अधिकार से वंचित कर देते हैं और स्वयं के विकास की संभावनाओं को भी संकीर्ण कर देते हैं । इसीलिए यदि हम 'अपरिग्रही' हो जाएँ ... तो हम-सबका विकास सुनिश्चित हो सकता है । इसीलिए ...

ग़लत अपने को केन्द्र मानना नहीं है ...
ग़लत तो है अपने को ही केन्द्र मानकर परिधि खींच लेना


आपका नीलेश
मुंबई

Wednesday, August 5, 2009

ज़िन्दगी का सच्चा सरमाया ...पूँजी क्या है ?

ये बात सब जानते हैं कि साथ कुछ नहीं जाता ... पर फिर भी हम सब परेशां रहते हैं । सच है कमाना जीने के लिए ज़रूरी है ... पर ऐसा कमाने में क्या फायदा जिसमें हम, वो सब कुछ खो दें... जो हमारे होने का सबब है । इसीलिये ये सिद्धांत अपनाना ही होगा कि 'धन हो बंधन नहीं' ... तब कमाई साधन बन जायेगी साध्य नहीं । इसलिए कुछ ऐसा भी कमाना होगा, जो जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन जाए ... ज़िन्दगी का सरमाया बन जाए ... और जो तब भी रहे, जब हम न हों ... और जो बँटवारे में भी बांटा न जा सके ... इसलिए आज :

कमाओ...
तो
कमाओ !
वो 'चार काँधे'
जिन्हें
तुम्हें उठाने का
अफ़सोस हो !
.... और जिनके
कांधों पर
तुम्हारा
जनाज़ा
बोझ हो !
!
आपका नीलेश
मुंबई

Monday, August 3, 2009

हम सब जानते हैं ...सिवाय

एक दिन एक जानने वाले का ख़त आया कि मैं आपके शहर में कुछ दिनों के लिए आ रहा हूँ ... आप मुझे किस अच्छे प्रवास स्थल के बारें में सूचित कर दें। मैंने सोचा ... मैं तो हमेशा इस शहर में अपने घर में ही रहा हूँ, तो फिर मैं कैसे जान सकता हूँ कि कौन सा प्रवास स्थल अच्छा है । जब इस पर गहन विचार किया तो लगा कि ये साधारण-सी बात अपने आप में कितना बड़ा फ़लसफा हो सकती है । बहुत बार हम ऐसी ही परिस्थितियौं में होते हैं, जब हम सब कुछ जानने का थोथा दावा तो करते हैं, पर उसी को नहीं जानते जो हमारे निकटस्थ होता है । ये हम स्वयं भी हो सकते हैं । इसीलिए शायद हमें और किसी की भी आवश्यकता पड़ती है, जो हमारे बारे में हमे बता सके । ये आँख बाहरी भी हो सकती है ... और हो सकता है कि हम स्वयं से ही निरपेक्ष होकर अपने को ही देखना सीख जाएँ ... परन्तु जब तलक ऐसा विकसित न हो जाए ... तब तक बाहर से ही अपने बारें में राय लेते रहिये ... ये बेहद जरूरी है, हम सब के लिए... क्योंकि ...

दुनिया से वाकिफ लोग
ख़ुद को कहाँ जानते हैं;
शहर की सरायों का हाल
मुसाफिर बेहतर जानते हैं


आपका नीलेश
Mumbai

'ध्यान' क्या है ?... क्या है 'ध्यान' ?!?... है क्या 'ध्यान' !!!

ये प्रश्न कोई नया नहीं है ... और मेरे लिए तो कदापि नहीं क्योंकि मैं अक्सर स्वयं से ये सवाल करता रहा हूँ। मैं कोई ज्ञाता नहीं पर मुझे लगता है कि लोग अक्सर शाब्दिक मौन को 'ध्यान' समझ लेते हैं; परन्तु अगर यही 'ध्यान' है तो यह कितना सतही और तर्कहीन होगा । इस परिस्थिति में तो जो कोई भी मूक होगा वो ध्यानस्थ मान लिया जाएगा, पर क्या यह उचित होगा? हाँ ये स्वीकार किया जा सकता है कि 'मानसिक मौन' ही ध्यान हो सकता है। ये वो अवस्था होगी जिसमें मानस शून्य-सा हो जाए ... विचार शून्य-सा। अगर ऐसा हुआ तो फिर इस निर्विचारावस्था से लाभ क्या? फिर लगता है कि अपने सन्निकट वातावरण से पूर्ण रूप से कट जाना ही ध्यानस्थ होना होता होगा ... पर ये तो बेहोशी हुई ! ऐसा लगता है कि जिस क्षण में जो मानस में केंद्रित है और जो उस क्षण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं अपेक्षित है ... उस के मूल तक पहुँच जाना ही 'ध्यान' का लक्ष्य होता है ...' ध्यान' होता है । संभवत: इसीलिए हमे सदैव - प्रतिदिन 'ध्यान' की आवश्यकता पड़ती है। मैं ये जानकर कभी भी प्रभावित नहीं होता कि वो इसलिए महान है कि उसने इतना लंबा तप किया ...ऐसे में मुझे लगता है कि समयावधि का दीर्घ होना उस केन्द्र तक पहुचने के लिए लिया गया वो समय है जो एकाग्रता की कमी से जन्मा क्योंकि सत्य तो ये है कि हम तप तो उस क्षण के लिए ही करते हैं जिस क्षण में विवेचित विषय फलीभूत हो जाए.... इसीलिए आज तक की जितनी समझ है ... उसके अनुपात में इतना ही :

तप के युग होते हैं; पर बोध का
क्षण !

आपका नीलेश
मुंबई


Friday, July 31, 2009

दुनिया का ये अजब दस्तूर है ... अपनी आँख ही अपने से दूर है

जिंदगी में हम... जाने कौन-कौन से किरदार निभाते हैं। एक फनकार की तरह हमें हर नए किरदार के लिए एक नया रूप रचना होता है ... मुखौटे भी लगाने होते हैं ... लेकिन आज की जिंदगी में जो दोहरापन हम जीने को मजबूर हैं ... वो इन अस्थायी मुखौटों को इतना स्थायी बना देता है कि हम उस झूठे चेहरे को ही सच मान बैठते हैं ... और तब एक अजब-सी बेचैनी भी होती है...जब आइना सामने होता है ... आँख को आँख तो दिखती है पर असली चेहरा नहीं तब हम अपने को ख़ुद ही नहीं पहचान पाते हैंआज इसी पर कुछ...

आँखें जिस चेहरे पर हैं
उसे देखने को तरस गयीं
सूरतें इस कदर
मुखौटों से चिपक गयीं...


आपका नीलेश
मुंबई

Wednesday, July 29, 2009

आज आँख नम है....

आज आँख नम है ... किसी ने कुछ ऐसा लिख दिया ...उसने किस को पा कर हमेशा के लिए खो दिया ... आज वो अकेला है ... आगे का रास्ता, उसे आँख की नमी से धुंधलाता दिख रहा है ...वो मुझसे मंजिल मांग रहा है... सवाल उठा रहा है ...वो कहाँ चला गया ...क्यों चला गया ... और अब वो क्या करे ?...??...???
जो चला गया है ... वो आज भी तुम्हारे साथ है... तेरे वज़ूद में ही उसका वज़ूद है ... और सुन सको तो वो आज भी तुम्हें पुकार कर कह रहा है :

जिस्म का कोई वज़ूद
साँसों का कोई सिलसिला
शर्त कुछ भी .. कोई भी ज़िन्दगी की
कुछ भी ज़रूरी नहीं है मेरे के होने के लिए
तुम हो ... तुम हो ... तुम हो ... तुम तो हो ...
ये बहुत है ... बहुत है... बहुत है मेरे होने के लिए ...!!!


आज सिर्फ़ इतना ही कह पाऊँगा।
आपका नीलेश,
मुंबई।

Monday, July 27, 2009

बाढ़ के आने से नदी नहीं बह जाती

सुनने में ये कुछ अजीब सा लग रहा है ...पर थोड़े गहरे उतरना होगा...क्योंकि जो जितने गहरे उतरता है...वो उतनी ही गहरी बात पकड़ पाता है। ये बात भी ऐसी ही है, सतह पर तो कुछ हासिल नहीं हो पायेगा। समझ लो ये बात कुदरत का एक सबक है। समझो तो बाढ़ है क्या...एक तरफ़ जिसके होने से जो है, उसका अतिरेक और एक तरफ़ मर्यादा के तटों का अपना वजूद खो देना। इंसानी ज़िन्दगी में भी तो ऐसा ही होता है। जहाँ कभी, कुछ अपनी समेटने की शक्ति से अधिक मिला वहीं वो बिखरने के कगार पर पहुँचा और अगर संभले नहीं तो ... वहीं टूटे सारे बाँध और जहाँ टूटे बाँध वहां आया जलजला ...फिर सब मिटने लगता है जो भी उसके संपर्क में आया ...पर और गहरे उतरें तो एक बात और समझ में आती है ...सब बह जाता है पर नदी अपने को बचाए हुए बहती रहती है। इस तरह 'बाढ़ प्रकृति का एक अजब पाठ है...एक तरफ़ वो दिखाती है सीमाओं में न रहने का नकरात्मक परिणाम और दूसरी तरफ़ देती है एक सकरात्मक संदेश कि जो अपने चरम पर भी समान रूप से निरंतर रहता है वही अपने मूल स्वरुप को समस्त विरोधात्मक परिस्थितियौं में बचा पाता है। अगर ये बात अभी भी अटपटी लगे तो एक बात सोचना और सोचते रहना कि

... बाढ़ के आने में नदी का क्या दोष ?


नीलेश जैन,
मुंबई

लिखो तो कुछ ऐसा लिखना ...

ये उन सब के लिए एक साथ -- जो अक्सर पूछते हैं कि क्या कभी कुछ ऐसा भी लिखा जा सकता है ...जो लोगों को अच्छा भी लगे और सच्चा भी । ...ऐसे प्रश्नों में कभी प्रश्न चिन्ह (?) लगा होता है; तो कभी विस्मयबोधक (!) ...दोनों ही परिस्थितियौं में मुझे एक ही युक्ति दीखती है :

एक दिन अपने सामने
साफ़
सा एक आइना रखना
फिर
उसके अक्स पर कुछ लिखना

कोई
ऐसी बात
तुम
उसमें कहना
जिसमें
सिर्फ़ तुम रहना

अपने
हर जज़्बात के साथ
सब
उजले - मैले ख्वाब के साथ
छू
लेने वाले एहसास के साथ

पर
जब भी धूमिल हो जाए
लिखने में ख़ुद का दिखना
तब
कभी नहीं ; तुम कुछ भी लिखना

क्योंकि बेहद ज़रूरी है
अपने
लिखे में दिखते रहना
और
ख़ुद को देखते हुए लिखते रहना...
~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~
तब ही ख़ुद को अच्छा लगेगा और दुनिया को सच्चा लगेगा . … शुभ सृजन ... रहे अनंत !!…

नीलेश जैन ,
मुंबई
२७-०७-२००९

Thursday, July 23, 2009

हताशा को हताश कर दो !

कभी ...अगर ऐसा लगे की तुम्हारे लिए हर रास्ता बंद हो गया है... तुम्हे अब कहीं भी; कितना भी, कभी भी स्वीकार किए जाने की संभावना मात्र भी शेष नही है ... तो भी घबराना नहीं ! कभी ऐसा भी लगेगा कि लोग तुम्हारे लिए अपने दरवाज़े बंद कर रहे हैं; तो भी हताश न होना क्योंकि हो सकता है कि वो दरवाज़ा सिर्फ़ वो तुम्हारे लिए ही बंद नही कर रहे हों; अपने लिए भी कर रहे हों ...सिर्फ़ तुम उनसे वंचित नही हो रहे हो...हो सकता है वो भी तुमसे वंचित हो रहे हों... परिस्थितियां दोनों के लिए समान हो सकती हैं। वैसे भी जब बाहर के दरवाज़े बंद होते हैं; तभी अन्तस् का --अन्दर का दरवाज़ा खुलता है; इसीलिए ठुकराए जाने से कभी न डरो क्योंकि ...

ठुकराया जाना तो एकलव्य और कबीर होने की शर्त होता है!

आपका नीलेश
मुंबई २४-०७-२००९

Friday, July 17, 2009

एक मशवरा जो है मशवरे से बड़ा

अक्सर लोग दूसरों को 'ये करो या वो करो' के मशवरे दिया करते हैं । असल में साहिलों पर बैठकर मशवरे देना बहुत आसान होता है; बजाय इसके कि ख़ुद पानी में उतरा जाए । जो लोग निष्क्रिय आलोचना मात्र ही करते हैं कोई सार्थक प्रयास नहीं ...ऐसे लोगों से मेरा कहना है :
बहुत हो चुके दूर से मशवरे
आइए अब पतवार में हाथ दीजिए
बहुत, बहुत हो चुकी है बारूद
अब हो सके तो थोड़ी आग दीजिए
बहुत च्छी है आपकी खामोशी
मगर वक्त की दरकार है
अब आवाज़ में आवाज़
दीजिए।।

...हाँ ये बात उस पर भी लागू होती है ...जो लिख रहा है :
नीलेश, मुंबई
१७-०७-०९

Monday, July 13, 2009

परम्परा की भी एक परम्परा होती है

'परम्परा' अतीत से वर्तमान तक का सफर होती है । जब इसमें वर्तमान की युगीन मांग को पूर्ण करने की शक्ति शेष नहीं रहती है तो यह धीरे-धीरे जड़ होने लगती है...और जब ये नकारात्मक परिणाम देने लगती है तो इसे ही 'प्रथा' मान लिया जाता है। इसलिए परम्परा को प्रथा मानने की भूल से बचना होगा और समझना होगा कि :

हर युग को
वर्तमान के सन्दर्भ में
परम्परा का परिष्कार चाहिये
अन्यथा आविष्कार चाहिये ......!

तट सिर्फ़ नदी के नहीं होते ...

तट सबको चाहिए ... तट नदी के लिए ही नहीं हम सबके लिए जरूरी हैं ... तट तो नदी होने की शर्त है ... दरिया तब तलक ही जिंदगी देता है, जब तलक अपने तटों के दरमियाँ बहता है ... उसी में उसकी भी ज़िन्दगी है और औरों की भी ... इसीलिए हमे भी समझना ही होगा कि...

यदि
तट होते
तो
नदी
बह पाती
... बह जाती !

गुरु हर युग में अपेक्षित है

यह जरूरी नहीं कि गुरु सबको मिल सके मगर उसकी तलाश जरूरी है फिर वह चाहे पत्थर की मूरत में ही क्यों न हो ...जो बोल तो नहीं सकती पर इसका एहसास तो कराती है कि कोई हमसे श्रेष्ठ है। इसीलिए कुछ पंक्तिया गुरु के नाम :

तुम्हारी सान* पर मिल सके मुझको धार
इसलिए मुझे अपना लोहा भूलना ही होगा!
और कलयुग के इस एकलव्य को भी
एक द्रोण ढूंढ़ना ही होगा
!!

(सान* = वह पत्थर जिस पर धार तेज़ की जाती है )

आपका अपना
नीलेश, मुंबई
१३/०७/०९

Tuesday, June 16, 2009

प्रेरणा कहती है...

जब
चढ़ रहे थे
तुम शिखर पर
तब 'मैं'
तुम्हारे साथ थी
और
जो जल रही थी
तेरे अन्दर
वो मेरी ही
आग थी !


ये बात तब लिखी जब.... एक बार देखा कि एक पर्वतारोही अकेला चढा जा रहा है ...उसे मालूम भी नहीं कि उसका अगला कदम उसे कहाँ ले जा सकता है ...फिर वो क्योँ चढ़ रहा है ...तब लगा ... कोई है ...कुछ है ...जो उसे ऐसा करने की शक्ति दे रहा है ... तब अनुभूत हुआ जब कोई साथ नहीं होता है, तब भी कोई 'प्रेरणा' हमारे साथ होती है ...वो आत्म -प्रेरणा भी हो सकती और पर-प्रेरणा भी ... उसकी आग ही उर्जा बनती है ....इसलिए जिसने उसको पा लिया तो समझो पा लिया कुछ करने का ...कुछ कर दिखाने का अनंत सूत्र ...अब बढ़ना तय है ... प्रेरणा का मार्ग सदैव 'शिखरोन्मुखी' जो होता है !

आपका
नीलेश जैन
मुंबई

Monday, June 8, 2009

बनना है तो वो बनो ....

जिस दिन ज़माने के चलन में ढल जाओगे
उस दिन खोटे सिक्के होकर भी चल जाओगे
पर जो बदलते हैं चलन दुनिया का
फिर उनके जैसे कहाँ बन पाओगे .

जो देता है एक शक्ल पिघले सुर्ख इस्पात को
वक्त के हिसाब से कभी हथियार, तो कभी औजार को
जिसके बनते हैं सांचे, बनना है तो वो फौलाद बनो
और सच में अगर दम हो तो ख़ुद टकसाल बनो.

Sunday, April 12, 2009

रहनुमा तेरे लिए

हर सड़क रास्ता नहीं होती
ये सबक सिखाया जिसने
आँख दी खुदा ने
पर सपना दिखाया जिसने ,
उठते हैं मेरे हाथ
आज उसकी दुआ के लिए ,
रहनुमा बनके हजारों का
वो एक और ज़िन्दगी जिये
हर मुकाम पर उसको
एक नयी मंजिल हासिल हो
वो बेपनाह काबिल है
अब और , और भी काबिल हो
और बीता हुआ हर लम्हा उसकी ज़िन्दगी का
उसकी ज़िन्दगी में फिर से शामिल हो !

...........................................
आप जिसे भी अपना रहनुमा मानते हैं ...
उनके जन्म-दिवस पर इसे एक विनम्र समर्पण मान लीजियेगा....
९-०४-२००९ पर
सादर नमन !
आपका
नीलेश

Sunday, March 1, 2009

एक पाती बचपन के नाम

बचपन एक सबक था
याद नहीं कि किस चीज की करी थी ज़िद्द
पर वो नसीहत अभी भी याद है
कि लौटती में दिलवाएंगे
या फिर ये कि अच्छा नही है आगे और अच्छा ….
बड़ों ने झूठ कहा था या सच
कह नहीं सकता …पर वो झूठ भी नहीं था
नहीं तो हर ज़िद्द को खरीदने में बिक जाते बड़े
… 

नीलेश जैन
मुंबई
२-०३-२००९

Tuesday, February 10, 2009

हर सड़क रास्ता नहीं होती


कहने को
ये बात मामूली है,
पर जिसे समझ आ गई;
तो समझो उसकी तलाश पूरी है.
अब जब उसने पा लिया है रास्ता तो
उसे
मंजिल भी मिल ही जायेगी
क्योंकि जो सड़क मंजिल तक ले जायेगी;
वही तो 'रास्ता' कहलायेगी.

ये बात इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि कुछ लोग सोचते है कि वो जो कर रहे हैं... और जैसे कर रहे हैं, वही सही है; पर हमेशा ऐसा सोचना भी एक बहुत बड़ी भूल के पहले की एक भूल ही तो है. इसीलिए इस बात को याद रखने में ही समझदारी हैये बात मुझ पर भी उतनी ही लागू होती है जितनी आप पर ...तो याद रखियेगा ...घर से लेकर बाहर तक ...इसमे एक गहरा सबक छिपा है ...जिंदगी को जीने का
आपका
नीलेश जैन



Tuesday, February 3, 2009

घर बुलाता है ..बहुत याद आता है

पहला गाना बच्चों को बहुत अच्छा लगा ...और अब एक और... विदेशों या बड़े शहरों में रहने वाले उन बच्चों के लिए, जिन्हें अपने मम्मी-पापा का साथ बहुत कम मिल पाता है, और वो अपने दादा-दादी और नाना-नानी के मीठे प्यार को अन्दर-ही-अन्दर बहुत मिस करते हैं :

समझा हम को पूरा बच्चा

घुमा -घूमा के देते गच्चा
एक था राजा एक थी रानी

रोज़-रोज़ बस वही कहानी


बच्चा सुन नहीं सकता है

न्यू -न्यू अच्छा लगता है

बात ये समझो बिटिया रानी

जानो हमरी ये परेशानी

कहाँ से लाये पप्पा ज़ानी

रोज़ -रोज़ एक नई कहानी

पप्पा कह नहीं सकता है

तुम बिन रह नहीं सकता है

हमने मन में अब ये ठानी

छुट्टी अब नहीं, यहाँ बितानी

न यहाँ दादी, न यहाँ नानी

बिन हाथ के लड्डू, मीठी बानी

बच्चा रह नहीं सकता है

न्यू -न्यू अच्छा लगता है

करने लगी है अब मनमानी

मेरी गुड़िया हुयी सयानी

हर बात तुम्हारी हमने मानी

रूठो न अब गुड़िया रानी

पप्पा सह नहीं सकता है

तुम बिन रह नहीं सकता है


आप सबका !

नीलेश जैन

मुंबई

04-02-2009