Thursday, December 22, 2011

कोई करे
तुमसे उम्मीद
तो ख़फ़ा क्यों !
मज़ारें भी तो
चादर माँगती हैं !!

आपका नीलेश
मुंबई

Wednesday, November 2, 2011

Thanks!

…Once Upon A Time I Was A Journalist

My days as a Journalist, taught me a lot, like:

You are in no-excuse business;

'worst conditions clause' never applies here;

here weather is meaningless;

learn to swim, skiing and if you can fly, it is far better;

nothing stale faster than news, so serve it fresh;

you have only 8 hours to make it or break it;

count your time as your breath...long pauses are not allowed;

don't try to write a perfect story all through the night, even 'Stop Press' has the time line;

a printed crude and half story is better than a polished and complete unpublished one;

we can not write an epic in a day, but its chapters;

even when you carry a story for long it must be as refreshing as day one, so be creative always;

it is a great lesson to learn how to draft quickly and craft nicely;

you cannot hold your breath forever so come out, be fearless and little more brave;

you won't find any other job with such diversity and sense of responsibility;

you will learn to treat even the tiniest issue or matter seriously;

if you place a wrong photograph just by seeing its dimensions, it actually means 'two';

you can see the sweet result of your efforts the very next morning; it inspires

you become an editor when you learn to convert news into views;

insight is always better than facts; so better be conceptual than factual;

if you cannot make HISTORY, at least you can write it;

we cannot leave our pages blank, and life too, so try to fill it fast;

if you cannot find a news, create it;

if you seed a news then you have to feed it too;

politically you should be non-aligned but practically you have to be pro-government;

if a published news earns you a friend, it means a foe too;

our job is to fill the space left blank by the advertisement department;

facing different situations daily enriches you to face this life and world too;

you will learn to control your emotions and sentiments and even your tears & smiles;

you will be more pragmatic;

you will learn to use correct words at correct places;

your grammar of life will be more accurate than your language;

your understanding of complex situations and power of comprehension will give you an extra edge in every walk of life as a common person or as the President of a company or a country;

if you cannot compromise, better fix an appointment with some good placement consultant and find a better job and excel there;

some day you will realize that my days in journalism made it possible to get me here;

then will come a day when people will write about you and you will get yourself published, not as a news reporter but as a news

&

then you will write a note of ‘THANKS’ like this.

- Neelesh Jain

Presently : Sr. Creative in an International Advertising Agency at Mumbai

neelesh.nkj@gmail.com


Friday, September 2, 2011

नया मुकाम

'तरक्की'
तब नहीं जब
कोई
बुलंदियों की
सीढ़ियाँ चढ़े
तब है
जब मिटने लगे
अन्दर की बेचैनी
और सुकूं बढ़े

आज ज़िन्दगी की राह पर एक नया मुकाम हासिल हुआ है।
आप सबका आशीर्वाद और प्यार यूँही बना रहे।

आप सबका
नीलेश


Wednesday, June 29, 2011

ज़्यादा ...ज़्यादा अच्छा नहीं

समंदर से मिलकर
वो
बस
कहने
को ज़्यादा हो गया ...
इससे तो अच्छा
कम था ...भला था
वो 'मीठा' दरिया'
जो अब
'खारा' हो गया...


आपका नीलेश
मुंबई

Tuesday, June 28, 2011

मजदूर

लगा सच
कि होती है
तकदीर
हाथ की
लकीर में
....
हाथ
कट गये
मेरे
जब से
मशीन में.

आपका नीलेश
मुंबई

Thursday, April 14, 2011

मुझे तो
वो आदमी भी
क़ातिल-सा दिखता है
पेड़ों को बचाने के लिए
जो किताबें लिखता है!


- आपका नीलेश जैन मुंबई


Wednesday, April 13, 2011

तन भी भीगा ... मन भी भीगा

तब
तन भी भीगा
मन भी भीगा
जब
मैंने गिरती बारिश से
पानी के धागे मांग लिए
और
अपनी आँख के कुछ आंसूं
उसके साथ में बाँध लिए ।

- नीलेश
मुंबई
मतलब तो परवान पर पाबंदी से है , पिंजरे नहीं हैं तो क्या ... पंख काट दीजिये
- नीलेश
मुंबई
पानी का एक कतरा भी
उसके लिए समंदर होता है,
जो रेत हो चुकी मिट्टी से
अपने बरतन धोता है
- नीलेश
मुंबई

Thursday, March 3, 2011

रेत के दरिया में पानी नहीं मिलता

कहने को शेख है
पर
पानी को तरसता है
उसके कुँओं से
बस
तेल जो निकलता है...


आपका
नीलेश
मुंबई

बेबस है ये बिदाई

पीतल का है झुमका
कांसे का है कंगना
चांदी की परत है
सोने का पानी है
कहने को गहना है
बस रस्म निभानी है...


किसी सत्यानुभूति से उपजी एक अभिव्यक्ति
आपका
नीलेश, मुंबई

Wednesday, January 26, 2011

शाब्दिक मौन 'शांत' होना है... और मानसिक मौन 'प्रशांत' होना

'मौन' को सभी सिद्धात्माओं ने अपनाया क्योंकि मौन से आत्म शोध का अवसर मिलता हैसमय-समय पर आत्म-शोध आत्म परिष्कार के लिए अपरिहार्य हो जाता हैकभी-कभी हम ऐसे दौर से गुजरते हैं जब ... जहाँ ... हमें ये अवसर ही नहीं मिलता कि हम अपने गत कार्यों और उनके प्रभावों का मूल्यांकन कर पाएं ...फिर ये प्रभाव स्वयं के सन्दर्भ में हो अथवा अन्य के सन्दर्भ मेंकभी-कभी इसका अनुमान हमें वाह्य स्रोतों से होता है, जिसमें यदि सब कुछ सकरात्मक होता है तब तो ठीक है अन्यथा नकरात्मकता से मानसिक नकरात्मकता ही जन्म लेती है... जो हमें अशांत कर जाती हैअपने पराये लगने लगते हैं, प्रतिपक्षी के स्थान पर विपक्षी का भाव जन्म लेने लगता है, चतुर्दिक अवसाद सक्रिय हो उठता हैऐसी अवस्था के लिए ही 'मौन' सार्थक उपाय एवं आत्म-आश्रय होता है ... आत्म-गुहा में ध्यानस्थ ये अवस्था हमें ये अवसर देती है कि हम आत्म आंकलन करें और स्वयं को ही सदैव सही समझने की भूल से भी उबरेये भी हो सकता है कि हम सही में सही हों परन्तु परिस्थितियों अथवा परिप्रेक्ष्य के सन्दर्भ में नहीं। 'मौन' एक ढाल है; निरर्थक वाद-विवाद के वार से बचने के लिए साथ ही निर्मूल्य आलोचना और मूल्यांकन के खिलाफ भी

ऐसे में यदि हम मौखिक मौन को धारण करते हैं तो मन 'शांत' होता है ... और अगर हम इस अवस्था से भी आगे निकल जाते है तो हमारा आंतरिक -द्वंद्व धीरे-धीरे शून्य हो जाता है ...यहीं पर मानस शांत होता है... और मानस का शांत होना ही 'प्रशांत' होना होता है...हर गौतम की आत्म-गवेषणा का आत्यंतिक लक्ष्य !

'शांत' हो...'प्रशांत' हो जाओगे!

आपका नीलेश
मुंबई

Thursday, January 6, 2011

ज़माना अज़ब सा हो गया है

ज़माना

अज़ब सा हो गया है

जिसके पास ज़्यादा है

उसी को लगता है

कहीं कुछ और कमी है।

हर कोई मशगूल है

ख़ुद में ... मगर

कहता है उसको

ज़माने की पड़ी है ।

सौ हाथ हैं

जिनके सहारे को

उनके पास ही

जादू की छड़ी है ।

जिनके पास

समय के लिए

समय ही नहीं

उनकी हर दीवार पर

एक घड़ी है ।


आपका नीलेश
मुंबई