Friday, November 16, 2012

मुझे 
मेरे
मरहूम 
वालिद
की
तिजोरी
से
एक
बेशकीमती
खज़ाना 
मिला

'...क्या हम ले गए
क्या तुम ले जाओगे...' 

ये 
लिखा 
बस 
एक
वसीयतनामा 
मिला !

- आपका नीलेश





Tuesday, October 9, 2012



यूँ 
तो
तराश 
सकता 
है
' वो '
कांच  
भी 
जिसमें 
तराशने
की 
खूबी  है। 

मगर 
सह 
सके 
तराशने 
की 
मार 
' जो '
उसके 
लिए  
अन्दर
से 
हीरा 
होना 
ज़रूरी है ।।

आपका  नीलेश जैन 

Tuesday, September 11, 2012


'उनके'
लिए 
गुल 
के 
रंग 
नहीं,
बस 
खुशबू
की 
बात है !

'जिनके '
लिए 
दिन 
भी 
रात है।

कुदरत का ये कैसा खेल है!
सूरज सबके हिस्से आया पर रोशनी नही!?!

आपका नीलेश जैन 

Friday, July 27, 2012

कहने को
एक ही दीवार पर होते हैं 
खिड़कियाँ और रोशनदान 
दोनों 
कहने को 
देते हैं एक-सी  हवा और रोशनी 
दोनों 
...

फिर भी अंतर  है 
रोशनदान 
हमेशा ऊपर होते हैं
ऊपर ही  रहते  हैं 
उन पर कभी नहीं होते  परदे
और 
खिड़कियाँ 
हमेशा नीचे होतीं हैं 
नीचे ही रहती हैं  
उन पर अक्सर होते हैं परदे
शायद इसलिए क्योंकि 
रोशनदान 
'होते'
 हैं 
और 
खिड़कियाँ 
'होती' 
हैं .


-- आपका नीलेश जैन 

Sunday, June 24, 2012

महानगरी

इधर 
किराये का 
टू बी. एच. के . मकान 
ठूंस-ठूंस के भरा है;
उधर 
पुश्तैनी 
तीन मंजिला घर 
खाली पड़ा है.

-----------------
आपका नीलेश, मुंबई
 

Wednesday, June 20, 2012

अति मारे मति

कुटिया भली ऊँच की 

खेत भला नीच का

अति मारे मति 

रस्ता भला बीच का  

 

इस पोस्ट में एक प्रसिद्ध कहावत का प्रयोग किया गया है,
जिसे मेरी मौलिकता न  मान लिया जाए.


आपका नीलेश

Wednesday, April 18, 2012

बहुत दूर...
निकल
गये होते ....
अगर
रास्ते
'सिर्फ'
क़िताबों में
होते ...

-----
आपका नीलेश

Saturday, March 10, 2012

जो
'गुज़र गया'
वो
'अच्छा था
....
आदमी
या
वक़्त

-----
आपका नीलेश

Monday, March 5, 2012

एक और याद

तब
चार आने की आती थी
छोटी वाली ...
हरी, नीली और मटमैली लाल
वैसे बड़ी भी आती थी
आठ आने की
पर अपना काम
छोटी से ही चल जाता था
पापा की दाढ़ी के ब्लेड से
लगाते थे चीरा
उस 'रबड़ की गेंद' में
और फिर
थोडा दबा के...
पिचका के
उसके अन्दर
मोड़कर रख देते थे
अपने प्यार की चिट्ठी
और फ़ेंक देते थे
जान बूझकर खुली छोड़ी गयी
उसकी खिड़की के अन्दर...
तब कहाँ होते थे एस.एम.एस!
---------------
आपका और उसका भी
नीलेश

Monday, January 30, 2012

जब छोटे थे तब एक थे

हम गलियों से ज़्यादा

छतों पर खेले

तब केवल

पतंग और कबूतर की उड़ान थी

या छोटी-छोटी मुंडेरों की छलांग थी

तब दूर तक फैली थी

हमारी छतों की दुनिया

तब तक दीवारें नहीं उठीं थीं

घर भले बंटे थे ;

मोहल्ले नहीं .

Friday, January 27, 2012

baat wo nahi jo dikhti hai

जब
लोग

समझ रहे  थे
वो
अँधेरे में है
...
दरअसल
तब

सूरज

उसकी
मुट्ठी में था


आपका नीलेश

Thursday, January 5, 2012

ज़िन्दगी कोई गणित की किताब नहीं


ज़िन्दगी

कोई गणित की किताब नहीं

यहाँ दो-और-दो ...हमेशा चार नहीं

जो ऊपर है, वो 'ऊपर' ही हो

या जो नीचे है , वो 'नीचे' ही हो

ये दुनिया की दलील है

तराज़ू का हिसाब नहीं ।

आपका नीलेश