Tuesday, August 25, 2009

ईश्वर की उपस्थिति में भी महाभारत क्यों?

यदि ऊपरवाले को अंतत: सब कुछ सही ही करना होता है, तो फिर विपत्ति क्योंकर आती है? ये सवाल सब के मन में उठता रहा है। यदि पांडव जीतने ही थे और सब कुछ पूर्व विदित एवं निश्चित ही था... तो फिर महाभारत हुआ ही क्यों? यदि स्वयं कृष्ण वहां उपस्थित थे, तो फिर अर्जुन भटके कैसे ... असमंजस की स्थिति कैसे जन्मी ??? प्रश्न अनेक हैं परन्तु उत्तर एक है कि जब तक परिस्थितियां अपने चरम पर नहीं पहुँच जाती तब तक वो मनोस्थिति बन ही नहीं पाती है कि कोई किसी मूल बात को समझ सके। संभवत: जब भी परिस्थितियां प्रतिकूल बनती हैं तो उन्हें ईश्वरीय विधान मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए ... इस आशा के साथ कि अवश्य ही कुछ अमूल्य -- अभूतपूर्व घटित होने को है... कोई जीवनामृत इन विष-मयी परिस्थितियौं से ... इस गहन मंथन से जन्म लेने वाला है ... क्योंकि ...

द्वंद्व में ही गीता जन्मती है !

आपका neelesh

3 comments:

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

प्रेरणादायक | बिलकुल सही लिखा है आपने |

Priya said...

hmm...
द्वंद्व में ही गीता जन्मती है ! bilkul sahi

Apanatva said...

itanee kam umr aur itanee gaharee soch......