Sunday, November 29, 2009

Maaf kijiyega...

यहाँ पहले माँ को समर्पित एक रचना थी ... जिसे सम्पूर्ण विश्व का परम स्नेह मिला ....लेकिन कुछ वरिष्ठ लोगों की सलाह पर उसे यहाँ से हटा दिया है… जिससे कम-से-कम ये रचना तो किसी दुरूपयोग का शिकार न हो पाये. 

दुरूपयोग करने वालों को ईश्वर अपना रचनात्मक-आशीर्वाद दे और इतनी प्रतिभा भी कि वो खुद .....
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आपका नीलेश

4 जुलाई 2 0 1 3
मुंबई


Thursday, November 12, 2009

मेरा ख़ुदा रहे सलामत मुझे मस्ज़िदों से क्या !!!

कई बार हम टूटने लगते हैं ... बिखरने के कगार पर आ खड़े होते हैं ... और कारण होता है, उन बे-वज़ह की बातों को जरूरत से ज़्यादा अहमियत दे देना, जो इसलिए अहम बन पड़ती हैं क्योँकि हमने उन्हें अहम मान लिया होता है। सच तो ये होता है कि हम मंजिल से निगाह हटा रहे होते हैं या उन मशवरों पर गौर करने लगते हैं जो गौर करने लायक नहीं होते या फिर उन उँगलियों को अपने ऊपर उठा मान कर ख़ुद को कमज़ोर समझने लगते हैं, जो कभी ख़ुद पर उठी हीं नहीं। ऐसे में एक सलाह है कि अगर ऐसा कुछ भी सफर के दरमियाँ आये ... तो उसे दरमियाँ ही छोड़ दें ...और बस मंजिल पर निगाह रखें और ख़ुद को समझाएं कि :

मेरी मंजिल रहे सलामत
मुझे रास्तों से क्या !
मेरा खुदा रहे सलामत,
मुझे मस्ज़िदों से क्या !!



Wednesday, November 4, 2009

वो दरख्त खो गए हम जिनकी शाख थे !


जो मैंने खोया ...
वो उसने भी खोया है ...
मेरी तरह वो भी बहुत रोया है ...
वो 'बड़ा' होकर भी मेरे छोटे भाई जैसा ही है ...
उस दिन लगा सब कुछ वैसा ही है ...

फर्क तो बस होता है जीते हुए इंसानों में
पर वो भी मिट जाता है आंसूं और श्मशानों में
नहीं तो भला क्या फर्क था उस दिन
उस आखिरी सफ़ेद लिबास में ...
उनके ठंडे पड़ चुके सर्द एहसास में ...
राम के नाम या चिता की तपन आग में ...
हमारी आँख की नमी या फिर 'राख' हो चुकी राख में ...
या उनके लिए कुछ कम कर पाने के गहरे पश्चाताप में ...
तब समझ आया बनता है नया रिश्ता दुःख की तपती आंच में !


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सादर नमन !
मौन शब्द- श्रद्धांजलि !!

नीलेश , मुंबई

Tuesday, November 3, 2009

नदी पानी से नहीं बहने से बनती है

होती रही गलती
कितनी बीती तारीखें
कितनी गुजरीं सदी
कहलाता रहा
ठहरा पानी तालाब
गिरता झरना
और बहता नदी
फिर भी हमने समझ लिया
पानी को नदी !
दरअसल
नदी पानी का नहीं बहने का नाम है
ऊंचाइयों से नीचे उतरते रहने का नाम है
बहते-बहते ... देते-देते गुजरने का नाम है
ये कुदरत का है एक सबक जो इंसानियत के नाम है


आपका नीलेश
मुंबई