Wednesday, February 24, 2010

अगर हो सके तो ....

अगर हो सके तो ...

इंसान मुकम्मल होना

अमन की ज़मीन में

अमन ही बोना ।


अगर हो सके तो

बिन मतलब के

कोई दोस्त बनाना

बिना शर्त का भी

एक रिश्ता निभाना

ख्वाहिशों को

हदों की हद

तक ही बढ़ाना

ईमान की चादर

तक ही पैर फैलाना

और जितना हो हासिल

उसे ही ख़ुशी से अपनाना

पर पाने की चाह में

ख़ुद को कभी खोना

क्योंकि

हर बात से ज़रूरी है

ख़ुद का होना ।


अगर हो सके तो

बिन कागज़

बिन क़लम

एक ऐसा भी

इतिहास लिखना

जिसमें इंसानी रिश्तों का

हर ज़ज्बात लिखना

पर जब तलक न हो

गहरे महसूस

तब तलक न

स्याही में

क़लम डुबोना

और लिखने में कुछ होना

तो हमेशा कबीर होना

अमन की ज़मीन में

अमन ही बोना


अगर हो सके तो

इंसान मुकम्मल होना

अमन की ज़मीन में

अमन ही बोना ....!!!


आपका नीलेश

मुंबई


Tuesday, February 16, 2010

क्या दुःख का कारण इच्छा है या ...?

इच्छा का त्याग महात्माओं के लिए तो सार्थक हो सकता है; परन्तु सामान्य मानव के लिए संभवतः यह संभव नहीं। हम जैसे सामान्य लोगों के लिए ये चरम अवस्था सामान्य जीवन के मध्यकाल में संभव नहीं हो पाती कभी व्यक्तिगत उपलब्धि की इच्छा से अथवा पारिवारिक-सामाजिक अपेक्षा से। इसीलिए इसे यूँ स्वीकार करना चाहिए कि हमें उस परम सन्देश को समझने के लिए प्रबुद्ध होना पड़ेगा और परम-इच्छा को जीवन में एक सोदेश्यपूर्ण लक्ष्य मानकर चरणबद्ध प्रयास करना ही होगा। ... और साथ ही यह भी समझना होगा कि सामान्य जीवन काल में दुःख का कारण इच्छा नहीं वरन इच्छा की पूर्ति होना है; इसीलिए अपरिहार्य है कि इच्छा संभाव्य हो ...सामर्थ्यानुकूल हो ... अन्यथा पहले सामर्थ्य अर्जित करो फिर इच्छा करो. इसीलिए यदि इच्छा 'पालो' तो प्रयास ऐसा हो कि उसे 'पा लो' अन्यथा वही दुःख का कारण है ... वही दुःख है ...वहीँ दुःख है

वैसे भी ये भी तो एक इच्छा ही है कि ... कोई इच्छा ही रहे!

आपका नीलेश
१७-०२-२००९