Thursday, August 26, 2010

घाटी की सुबह सूरज से नहीं रौशनी से होती है

हर किसी के नसीब में हो सूरज
ये ज़रूरी नहीं
मगर रौशनी तो होती है
हथियार से कब सुलझे हैं मसले
पिघलाकर उन्हें औजार बना लो
इल्म की हर किताब ये ही कहती है

2 comments:

DEEPAK BABA said...

बहुत ही सुंदर ..
अच्छी सोच प्रस्तुत की है.
बधाई

Apanatva said...

BHUT BAHUT SUNDER BHAV O KEE UPAJ HAI YE RACHANA.........
BADHAI..........