Wednesday, August 5, 2009

ज़िन्दगी का सच्चा सरमाया ...पूँजी क्या है ?

ये बात सब जानते हैं कि साथ कुछ नहीं जाता ... पर फिर भी हम सब परेशां रहते हैं । सच है कमाना जीने के लिए ज़रूरी है ... पर ऐसा कमाने में क्या फायदा जिसमें हम, वो सब कुछ खो दें... जो हमारे होने का सबब है । इसीलिये ये सिद्धांत अपनाना ही होगा कि 'धन हो बंधन नहीं' ... तब कमाई साधन बन जायेगी साध्य नहीं । इसलिए कुछ ऐसा भी कमाना होगा, जो जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन जाए ... ज़िन्दगी का सरमाया बन जाए ... और जो तब भी रहे, जब हम न हों ... और जो बँटवारे में भी बांटा न जा सके ... इसलिए आज :

कमाओ...
तो
कमाओ !
वो 'चार काँधे'
जिन्हें
तुम्हें उठाने का
अफ़सोस हो !
.... और जिनके
कांधों पर
तुम्हारा
जनाज़ा
बोझ हो !
!
आपका नीलेश
मुंबई

3 comments:

Siddharth said...

Great Philosophy !! Touched my heart. itni acchi baat likhne ke liye bahut bahut shukriya.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सुंदर सलाह।

रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!

Meenu khare said...

बहुर अच्छा दर्शन है आपका नीलेश !
इतनी अच्छी बातें लिखने के लिए
अच्छा मन भी तो चाहिए ....बधाई .