Tuesday, February 16, 2010

क्या दुःख का कारण इच्छा है या ...?

इच्छा का त्याग महात्माओं के लिए तो सार्थक हो सकता है; परन्तु सामान्य मानव के लिए संभवतः यह संभव नहीं। हम जैसे सामान्य लोगों के लिए ये चरम अवस्था सामान्य जीवन के मध्यकाल में संभव नहीं हो पाती कभी व्यक्तिगत उपलब्धि की इच्छा से अथवा पारिवारिक-सामाजिक अपेक्षा से। इसीलिए इसे यूँ स्वीकार करना चाहिए कि हमें उस परम सन्देश को समझने के लिए प्रबुद्ध होना पड़ेगा और परम-इच्छा को जीवन में एक सोदेश्यपूर्ण लक्ष्य मानकर चरणबद्ध प्रयास करना ही होगा। ... और साथ ही यह भी समझना होगा कि सामान्य जीवन काल में दुःख का कारण इच्छा नहीं वरन इच्छा की पूर्ति होना है; इसीलिए अपरिहार्य है कि इच्छा संभाव्य हो ...सामर्थ्यानुकूल हो ... अन्यथा पहले सामर्थ्य अर्जित करो फिर इच्छा करो. इसीलिए यदि इच्छा 'पालो' तो प्रयास ऐसा हो कि उसे 'पा लो' अन्यथा वही दुःख का कारण है ... वही दुःख है ...वहीँ दुःख है

वैसे भी ये भी तो एक इच्छा ही है कि ... कोई इच्छा ही रहे!

आपका नीलेश
१७-०२-२००९

9 comments:

Vijay Kumar Sappatti said...

aapne bilkul sahi likha hai neelesh bhai .. jeevan me saare dukho ka kaaran sirf iccha hi hai .. maine bhi kuch likha tha , abhi post nahi kiya hai ... aapka aabhaar

vijay

दिगम्बर नासवा said...

अच्छा लिखा है नीलेश जी .... इच्छा पालो तो इतनी शक्ति होनी चाहिए की इच्छा पा लो ....

Apanatva said...

पहले सामर्थ्य अर्जित करो फिर इच्छा करो. इसीलिए यदि इच्छा 'पालो' तो प्रयास ऐसा हो कि उसे 'पा लो' अन्यथा वही दुःख का कारण है ... वही दुःख है ...वहीँ दुःख है।

aisee soch ise umr me..........naaz hai hum ko ise soch par.........aapkee..........
aasheesh

shama said...

Sahi kaha Digambarji ne!

Dr. Krishna said...

100 % AGREED . ISSCHA KI PURTI NA HOONA MATLAB KE PURE MANN SE PRYAAS / ISSCHA NA KARNA HAI.

परमजीत बाली said...

सहमत।

RaniVishal said...

यदि इच्छा 'पालो' तो प्रयास ऐसा हो कि उसे 'पा लो'
ek dum sahi baat hai ji!

priya ranjan pandey said...

namaskar nilesh bhai.
kya satik baaten likhi hain.
saty hi, dukh ka karan to ichchha hi hai. aur sukh ka karan bhi multah ichchha hi hai. jab ichchha puri ho jati hai, to sukh hota hai; aur agar puri na ho, to dukh hota hai. saara samsar sukh aur dukh ke chakkar me hi para rahata hai. aur asal me inhi dono ki ichchha bhi karta hai. sukh ko pane aur dukh se door jaane ki ichchha. ye ajeeb kism ka gol-chakkar hai nilesh ji. sukh-dukh ka karan ichchha hai, aur ichcha ka karan sukh-dukh.

aur kya baat kahi hai aapne, ki agar ichchha pa lene ki kubbat ho, tabhi ichchha "palo".

P.S.- maine apne blog me ek darshanik samasya likhi hai. jise hal karne me main aap jaise mitron aur vicharkon ki madad ki aasha karta hun.

सिद्धार्थ प्रियदर्शी said...

वैसे भी ये भी तो एक इच्छा ही है न कि ... कोई इच्छा ही न रहे!..........

क्या बात है!!!! लाजवाब !!!
बहुत उम्दा बात कही गयी है आप के द्वारा.....कि....

सामान्य जीवन काल में दुःख का कारण इच्छा नहीं वरन इच्छा की पूर्ति न होना है; इसीलिए अपरिहार्य है कि इच्छा संभाव्य हो ...सामर्थ्यानुकूल हो ... अन्यथा पहले सामर्थ्य अर्जित करो फिर इच्छा करो