Tuesday, November 2, 2010

हम घड़े बना सकते हैं; मिट्टी नहीं !

हम जो साकार करते हैं, अक्सर उसे ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मान बैठते हैंइसी से हमारे अन्दर अहम् जन्म लेता है और हम उस अहम् के दायरे में सिमट कर रह जाते हैं

देने वाले ने हमें असीम संभावनाएं दी हैं...
हम उन्हें खोजें और पाएं ...
और कभी भूलें कि
हम सिर्फ घड़े बना सकते हैं; मिट्टी नहीं।

8 comments:

Apanatva said...

kitnee samjhdaree kee baat kitnee sahjata se samjhagaye............
Aasheesh.

Udan Tashtari said...

बिल्कुल सही सलाह!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सब कुछ मिट्टी से बनता है और सब कुछ मिट्टी हो जाता है।

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही पते की बात कही है आपने ... कुदरत का काम बस कुदरत ही कर सकती है ...

ajit gupta said...

हम तो केवल प्रकृति को नया रूप दे सकते हैं प्रकृति का रचनाकार तो और ही कोई है। बस इसी सत्‍य को भूल जाते हैं और अहंकार पाल लेते हैं। छोटी रचना पर गहरी बात।

Meenu Khare said...

बहुत ही पते की बात कही है आपने

uthojago said...

big truth in few words

निर्मला कपिला said...

सत्य वचन। शुभकामनायें।