Monday, December 22, 2014

ख़ुद  के हाथों में है 
ख़ुद का ताना-बाना 
ये तो तुम पर है 
तुम बीज बनो या दाना 

बनकर दाना 
पिसकर भूख मिटाना
या बन बीज
मिलकर माटी में 
नयी फसल उगाना 
ये तो तुम पर है 

ये तो तुम पर है 
तुम बीज बनो या दाना

पर मुझको तो आते-जाते 
बस इतना है कहते जाना

'कल को चाहे कुछ भी होना  
अपना बीज कभी न खोना ! '

आपका
नीलेश जैन
मुंबई

1 comment:

Digamber Naswa said...

गहरी सोच से उपजी रचना ... अर्थपूर्ण ...