Saturday, October 24, 2009

विगत के प्रति कृतज्ञ होना सीखो!

आज एक समस्या है ... है भी या नहीं ... या फिर एक नकारात्मक अनुमान मात्र है ... ये निर्भर करता है सबके अपने-अपने सामाजिक अनुभव या निजी अनुभूति पर - और वो समस्या यह है कि आज की पीढ़ी विगत को महत्व नहीं देती ... या देना नहीं चाहती ... वो आज की उपलब्धि के लिए विगत पीढ़ी को वर्तमान की 'वर्तमान' परिस्थिति के लिए कोई भी; कितना भी या फिर कुछ भी महत्व नहीं देना चाहती। इसके पीछे मूल भाव ये सक्रिय दीखता है कि आज की पीढ़ी की दृष्टि में ...जो गत युग बीता है वो पुरातन था ... आधुनिकता से रीता था । तकनीकी तो थी परन्तु प्रौद्यागिकी नहीं। प्रौद्यागिकी आज मनुष्य-को-मनुष्य से जोड़ तो रही है परन्तु संबंधों का ये नवीन समाजशास्त्र संचार की उपयोगिता को 'कार्य सिद्धि के साधन मात्र' रूप में ही देखता है; मानवीय सद्-भावना के सेतु के रूप में नहीं। इसीलिए प्रौद्यागिकी ने उन लोगों को तो पास लाया जो दूर थे; पर वो दूर होने लगे जो पास थे। हमने दूरस्थ से तो संवाद साधना सीख लिया परन्तु निकटस्थ से नहीं। यहीं नयी पीढ़ी में एहसास-ए -बेहतरी का निरर्थक भाव जागा ... उन्हें लगा कि विगत पीढ़ी नयी सीख के लिए हम पर नितांत निर्भर है ... हमे विज्ञानं का अधिक उपयोग आता है... यहीं उनसे मूल की भूल हुयी ... वे भूल गए कि आज जिस का प्रयोग कर वो अपने को आधुनिक और प्रगतिशील मान रहे हैं, उसकी नींव में यही विगत पीढ़ी है। इसीलिए उन्हें विगत के प्रति कृतज्ञ होना सीखना होगा और साथ ही यह भी समझना होगा कि :

'कंप्यूटर तक हम बिना कंप्यूटर के ही पहुंचे हैं। '

आपका नीलेश
मुंबई

2 comments:

सुशान्त सिंहल said...

आज पहली बार ही आपके ब्लॉग पर आना हुआ। ’अम्मा’ कविता से आपकी अम्मा के मानों दर्शन हो गये। उनको मेरा प्रणाम दीजियेगा।

"विगत के प्रति...." पढ़ कर ऐसा लग रहा है कि हम पूर्व परिचित ही हैं। दूर वालों से संवाद करना सीख लिया, निकटस्थों को भूल गये - कितनी सही बात कही है आपने। वैसे मुझे लगता है कि भारत कभी विज्ञान में, ज्ञान में, तकनीक में, शिक्षा में बहुत बढ़ा चढ़ा रहा होगा - इतना अधिक कि आज के वैज्ञानिक उस काल खण्ड के वैज्ञानिकों के सम्मुख बौने ही लगते हैं। उस समय का architecture, metallurgy, plastic surgery, yoga, poetry, astronomy सभी कुछ तो आज से बेहतर है। लखनऊ का इमामबाड़ा, जयपुर व दिल्ली में जन्तर मंतर, महरौली का विजय स्तंभ उस स्वर्णिम युग की दास्तान खुद ब खुद बयां करने में सक्षम हैं। भारतीय पंचांग पांच सौ से भी अधिक वर्षों पुराने उपलब्ध हैं जिनमें सूर्योदय, सूर्यास्त, सूर्यग्रहण व चन्द्रग्रहण की बिल्कुल सही भविष्यवाणी की जाती रही। सौ या दो सौ वर्ष बाद आने वाले चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहण की सही भविष्यवाणी कर सकने के लिये क्या - क्या जानकारियां होनी आवश्यक होती हैं ? ये सारा ज्ञान बिना अत्याधुनिक यंत्रों (यथा इलेक्ट्रॉनिक टेलिस्कोप, कंप्यूटर आदि) के उस समय के ज्योतिर्विज्ञानियों ने कैसे प्राप्त किया होगा?

आधुनिक पीढ़ी को अंग्रेज़ी न जानने वाले माता-पिता व अन्य लोग कम अक्ल अनुभव होते हैं। स्वयं के प्रति एक झूठा श्रेष्ठता का अहसास पलने लगता है, पर क्या बहुत सारे माता-पिता आज ऐसे नहीं हैं जो अपने बच्चे को ’पब्लिक स्कूल’ में इस लिये पढ़ाते हैं कि वह अंग्रेज़ी बोलना सीख जाये जो वह खुद कभी नहीं बोल सके! घर में किसी मेहमान के आते ही बच्चे के अंग्रेजी ज्ञान का फूहड़ प्रदर्शन करना आखिर क्या दर्शाता है? जब बच्चे बचपन से यही देखते हैं कि Johny Johny Yes Papa सीख लेने के बाद उनके माता पिता उनकी बलैयां लेते हैं, गर्व अनुभव करते हैं तो क्या यह गर्व की भावना बच्चों के भीतर नहीं पहुंचती होगी ?

सुशान्त सिंहल
www.thesaharanpur.com
www.sushantsinghal.blogspot.com

Apanatva said...

so true! good post.