Tuesday, October 20, 2009

दीपावली के निहितार्थ

दीपावली अर्थात् दीपों की अवली ... एक दीप नहीं अनेक दीपों का एक पंक्तिबद्ध होना ... एक साथ जगमग होना। ये एक संदेश है, उस देश को जहाँ यदि अपने आप में 'एक दीप' होने का भी प्रबुद्ध-संदेश दिया गया तो साथ ही सबके साथ होने का भी। इन अर्थों में यह पर्व भारत की सामासिक संस्कृति का प्रतीक पर्व भी बन जाता है।
लक्ष्य के प्रतीक के रूप में 'लक्ष्मी' की पूजा-अर्चना का विधान किया गया तो ईश के गण के रूप में - मुखिया के रूप में 'गणेश' का भी अर्थात् लक्ष्य को लक्षित करो और साथ ही जो सर्वप्रमुख है - मुख्य है, उसे सदैव प्राथमिकता दो ।
शुभ-लाभ भी कहा गया अर्थात यह शुद्ध भाव भी रखा गया कि लाभ तो हो परन्तु हो शुभ। यूँ तो लाभ को सदैव दूसरे की हानि के रूप में ही देखा जाता है परन्तु 'शुभ-लाभ' की संकल्पना का निहितार्थ है ...यथोचित लाभ ... उतना लाभ जितना जीवनोपार्जन के लिए - जीवकोपार्जन के लिए उचित हो ... जो सम्पोषणीय हो ... सेवा अथवा वस्तु की उपलब्धता हेतु - सेवार्थ आवश्यक हो; किसी की मजबूरी अथवा विवशता के नाम पर जो शोषणकारी न हो।
स्वच्छता को लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रथम माना गया ... समस्त आंतरिक मलिनता को साफ़ किए बगैर लक्ष्य की प्राप्ति असंभव है ... यहाँ मार्ग की शुद्धता का चिरंतन मूल्य भी सुनिश्चित किया गया ... सच है जब तक अंत:गृह में निरर्थक की उपस्थिति रहेगी तो सार्थक के लिए स्थान ही कहाँ उपलब्ध हो सकेगा!
इसे 'नव वर्ष' भी माना गया ... परन्तु यह उसी के लिए नव वर्ष है जिसने इन निहितार्थों को समझ लिया ...

आपके जीवन में भी
एक ऐसी दीपावली आए ...
एकमत सब दीप जलें
और नव वर्ष हर्षाए
!!!

आपका नीलेश

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