Tuesday, November 3, 2009

नदी पानी से नहीं बहने से बनती है

होती रही गलती
कितनी बीती तारीखें
कितनी गुजरीं सदी
कहलाता रहा
ठहरा पानी तालाब
गिरता झरना
और बहता नदी
फिर भी हमने समझ लिया
पानी को नदी !
दरअसल
नदी पानी का नहीं बहने का नाम है
ऊंचाइयों से नीचे उतरते रहने का नाम है
बहते-बहते ... देते-देते गुजरने का नाम है
ये कुदरत का है एक सबक जो इंसानियत के नाम है


आपका नीलेश
मुंबई

6 comments:

Dr. Smt. ajit gupta said...

नदी पानी नहीं बहने का नाम है, सभी को जीवन देने का नाम है। अच्‍छी रचना, बधाई।

दिगम्बर नासवा said...

अच्छी रचन नीलेश जी ......... नदी और पानी के फर्क को बारीकी से समझाती हुयी .......

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर भाव हैं।बहुत बढ़िया लिखा है-

दरअसल
नदी पानी का नहीं बहने का नाम है ।
ऊंचाइयों से नीचे उतर जाने का नाम है ।
बहते हुए और देते हुए गुजर जाने का नाम है ।
ये कुदरत का है एक सबक जो इंसानियत के नाम है ।

पी.सी.गोदियाल said...

कविता के माध्यम से अच्छा सन्देश दिया आपने !

Harkirat Haqeer said...

दरअसल
नदी पानी का नहीं बहने का नाम है ।
ऊंचाइयों से नीचे उतर जाने का नाम है ।
बहते हुए और देते हुए गुजर जाने का नाम है ।
ये कुदरत का है एक सबक जो इंसानियत के नाम है ...

वाह ....!!

बहुत ही लाजवाब बात कह दी आपने .....!!

Meenu Khare said...

आज बहुत दिन बाद आपके ब्लॉग पर आई. कई सारी अच्छी चीज़े पढ़ने को मिलीं. अच्छी रचनाशीलता की बधाई.