Monday, January 30, 2012

जब छोटे थे तब एक थे

हम गलियों से ज़्यादा

छतों पर खेले

तब केवल

पतंग और कबूतर की उड़ान थी

या छोटी-छोटी मुंडेरों की छलांग थी

तब दूर तक फैली थी

हमारी छतों की दुनिया

तब तक दीवारें नहीं उठीं थीं

घर भले बंटे थे ;

मोहल्ले नहीं .

4 comments:

सदा said...

बहुत बढि़या।

Apanatva said...

kya din the vo bhee..........

ab yade maatr jeevan mahaka detee hai........

aabhar.

Vaanbhatt said...

अब तो घर के कोने भी बँट गये हैं...

vidya said...

बहुत बहुत सुन्दर..........