इस बरस एक वादा करें
जो हम हैं बस वही होने का
अपनी पहचान को पहचानकर
उसको नहीं खोने का
क्योंकि ख़ुद की झूठी पहचान
एक दिन ख़ुद को ही छल जाती है
वैसे भी चिकने कागज़ पर छपने से
कहानी नहीं बदल जाती है .
---- नया साल मुबारक हो!
आपका नीलेश जैन
मुंबई
Monday, January 3, 2011
Wednesday, November 10, 2010
किसी के पेड़ गमलों में लगे हैं; तो किसी के जमीन में
इससे फर्क तो पड़ता ही है कि किसकी जड़ों को जमने के लिए कितनी मिट्टी मिली है और कितना फैलाव। सच तो ये है कि जड़ों की गहराई जितनी गहरायेगी ... ऊँचाई उतनी ही ऊँचान पायेगी! इसीलिए जरूरी है कि हम अपनी गहराई बढाएं और फैलाव भी ... कभी समझ की; तो कभी नज़रिये की।
ये भी सच है कि हम सबको पनपने के लिए न तो एक जैसा वातावरण मिलता है और न ही अवसर। इसीलिए ये भेद तो स्वाभाविक है; लेकिन ये अस्वाभविक है कि हम इस भेद को शून्य करने के लिए प्रयास न करें। कोई बात नहीं कि हमारे बीते हुए कल ने हमें क्या दिया पर आज अगर हमारा विवेक सच में विवेकशील है, तो हम विस्तार को ही चुनेंगे और आने वाले कल के लिए ये संकल्प लेंगे कि हम अपने दायरों के दायरे तक सीमित नहीं रहेंगें ... सोच को नया आकाश देंगें... और विचार को नया सागर ।
आपका नीलेश
मुंबई
ये भी सच है कि हम सबको पनपने के लिए न तो एक जैसा वातावरण मिलता है और न ही अवसर। इसीलिए ये भेद तो स्वाभाविक है; लेकिन ये अस्वाभविक है कि हम इस भेद को शून्य करने के लिए प्रयास न करें। कोई बात नहीं कि हमारे बीते हुए कल ने हमें क्या दिया पर आज अगर हमारा विवेक सच में विवेकशील है, तो हम विस्तार को ही चुनेंगे और आने वाले कल के लिए ये संकल्प लेंगे कि हम अपने दायरों के दायरे तक सीमित नहीं रहेंगें ... सोच को नया आकाश देंगें... और विचार को नया सागर ।
आपका नीलेश
मुंबई
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Tuesday, November 2, 2010
हम घड़े बना सकते हैं; मिट्टी नहीं !
हम जो साकार करते हैं, अक्सर उसे ही अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मान बैठते हैं । इसी से हमारे अन्दर अहम् जन्म लेता है और हम उस अहम् के दायरे में सिमट कर रह जाते हैं।
देने वाले ने हमें असीम संभावनाएं दी हैं...
हम उन्हें खोजें और पाएं ...
और कभी न भूलें कि
हम सिर्फ घड़े बना सकते हैं; मिट्टी नहीं।
देने वाले ने हमें असीम संभावनाएं दी हैं...
हम उन्हें खोजें और पाएं ...
और कभी न भूलें कि
हम सिर्फ घड़े बना सकते हैं; मिट्टी नहीं।
Sunday, October 17, 2010
पापा की पहली बरसी पर जब मैं घर गया
मेरा दामन फिर अश्कों से भर गया
पापा की पहली बरसी पर जब मैं घर गया
घर मुझे बहुत उदास लगा
उसमें किसी बड़े बुजुर्ग-सा एहसास लगा
तब लगा पत्थर भी प्यार करते हैं
वो भी इंतज़ार करते हैं
इन बीते हुए सालों में
कितना कुछ बदल गया था
जिस घर के सांचे में हम ढले थे
वो ख़ुद कितना 'ढल' गया था
अजब था कुदरत का ये खेल भी
कि मुरझा गये थे वो पेड़
जो हमने ख़ुद लगाये थे
और लहरा रहे थे वो
जो ख़ुद उग आये थे
घर के सामनेवाला गुलमोहर
घर पर छतरी-सा छा गया था
और ज़मीन के अन्दर-ही-अन्दर
नींव तक आ गया था
ये देख
एक बुजुर्ग पड़ोसी ने मुझे बुलाया था
और कंधे पर हाथ रखकर
बड़े प्यार से समझाया था ...
जब पेड़ की शाखाएं
बहुत दूर तक फैल जाती हैं
तो वो जड़ों से
बहुत दूर चली जाती हैं
फिर वो पेड़ बिखर सा जाता है
और एक दिन अपने बोझ से
ख़ुद ही गिर जाता है
जिस दिन झुका हुआ ये पेड़
अचानक गिर जायेगा
साया-तो-साया...
नींव भी ले जायेगा...
इसीलिए आते-जाते रहा करो
अगर वक़्त रहते न इनका ख़्याल होगा
तो ज़िन्दगी भर इसका मलाल होगा
दरअसल वो कह कुछ रहे थे
और समझा कुछ रहे थे
तब लगा
एक अजब निगाह होती है
बुजुर्गों में
और कितना गहरा सच छिपा होता है
उनके तजुर्बों में ....
-------------------------------
आप सबका
नीलेश
मुंबई
पापा की पहली बरसी पर जब मैं घर गया
घर मुझे बहुत उदास लगा
उसमें किसी बड़े बुजुर्ग-सा एहसास लगा
तब लगा पत्थर भी प्यार करते हैं
वो भी इंतज़ार करते हैं
इन बीते हुए सालों में
कितना कुछ बदल गया था
जिस घर के सांचे में हम ढले थे
वो ख़ुद कितना 'ढल' गया था
अजब था कुदरत का ये खेल भी
कि मुरझा गये थे वो पेड़
जो हमने ख़ुद लगाये थे
और लहरा रहे थे वो
जो ख़ुद उग आये थे
घर के सामनेवाला गुलमोहर
घर पर छतरी-सा छा गया था
और ज़मीन के अन्दर-ही-अन्दर
नींव तक आ गया था
ये देख
एक बुजुर्ग पड़ोसी ने मुझे बुलाया था
और कंधे पर हाथ रखकर
बड़े प्यार से समझाया था ...
जब पेड़ की शाखाएं
बहुत दूर तक फैल जाती हैं
तो वो जड़ों से
बहुत दूर चली जाती हैं
फिर वो पेड़ बिखर सा जाता है
और एक दिन अपने बोझ से
ख़ुद ही गिर जाता है
जिस दिन झुका हुआ ये पेड़
अचानक गिर जायेगा
साया-तो-साया...
नींव भी ले जायेगा...
इसीलिए आते-जाते रहा करो
अगर वक़्त रहते न इनका ख़्याल होगा
तो ज़िन्दगी भर इसका मलाल होगा
दरअसल वो कह कुछ रहे थे
और समझा कुछ रहे थे
तब लगा
एक अजब निगाह होती है
बुजुर्गों में
और कितना गहरा सच छिपा होता है
उनके तजुर्बों में ....
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आप सबका
नीलेश
मुंबई
Friday, August 27, 2010
बड़े हुए तो ...एक छोटी बात समझ में आयी
बड़े हुए
तो
ये बात
समझ में आयी,
'धागे'
उँगलियाँ
बुनती थीं;
न कि सलाई .
तो
ये बात
समझ में आयी,
'धागे'
उँगलियाँ
बुनती थीं;
न कि सलाई .
Thursday, August 26, 2010
घाटी की सुबह सूरज से नहीं रौशनी से होती है
हर किसी के नसीब में हो सूरज
ये ज़रूरी नहीं
मगर रौशनी तो होती है
हथियार से कब सुलझे हैं मसले
पिघलाकर उन्हें औजार बना लो
इल्म की हर किताब ये ही कहती है
ये ज़रूरी नहीं
मगर रौशनी तो होती है
हथियार से कब सुलझे हैं मसले
पिघलाकर उन्हें औजार बना लो
इल्म की हर किताब ये ही कहती है
Wednesday, June 2, 2010
जब लगे कि हमारी ज़िन्दगी बेमानी है ... तब ख़ुद से एक सवाल करना
When you feel you are lost
When you find you are defeated
Nothing is in your favour
Then close your eyes and
Go back to your memory lane
Then you will find
Your efforts have
Never gone in-vain.
You have already done it
You have contributed enough
By living for others
For your family and brothers
For the country & community
For the greater cause of humanity
Look around and try to find
Who else did so?
To make others grow
Remember your dreams
And think of today
What you lost and
What you gained
And on you, what,
ALMIGHTY have rained
From nowhere to here
Whatever is there
It is the fruit of your toil
You have redeemed off
The debt of the soil
You have already done it!
When you feel you are lost
When you find you are defeated
Nothing is in yr favour
Then some day at late night
Go out on a path with least light
With no body except you
As a hard critic with inner view
Then walk slowly & lonely
And remember
You never compromised
For your values
Remained intact one & all
Never went against your inner call
But if you do not find the answers
Then you are really lost
Then you are really defeated
Then really nothing is in favour
As you are not in your favour
Then you have to think deep
Then to a conclusion
You have to reach
But if you have the answers
Positive and right
Then nothing is lost
Nothing is defeated
Nothing is against you
This phase is just
A matter of time
You just have to
Recollect your inner might
And you just have to fight.
…… you just have to fight.
आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर लौट पाया हूँ ... माफ़ कर दीजियेगा !
आपका नीलेश
When you find you are defeated
Nothing is in your favour
Then close your eyes and
Go back to your memory lane
Then you will find
Your efforts have
Never gone in-vain.
You have already done it
You have contributed enough
By living for others
For your family and brothers
For the country & community
For the greater cause of humanity
Look around and try to find
Who else did so?
To make others grow
Remember your dreams
And think of today
What you lost and
What you gained
And on you, what,
ALMIGHTY have rained
From nowhere to here
Whatever is there
It is the fruit of your toil
You have redeemed off
The debt of the soil
You have already done it!
When you feel you are lost
When you find you are defeated
Nothing is in yr favour
Then some day at late night
Go out on a path with least light
With no body except you
As a hard critic with inner view
Then walk slowly & lonely
And remember
You never compromised
For your values
Remained intact one & all
Never went against your inner call
But if you do not find the answers
Then you are really lost
Then you are really defeated
Then really nothing is in favour
As you are not in your favour
Then you have to think deep
Then to a conclusion
You have to reach
But if you have the answers
Positive and right
Then nothing is lost
Nothing is defeated
Nothing is against you
This phase is just
A matter of time
You just have to
Recollect your inner might
And you just have to fight.
…… you just have to fight.
आज बहुत दिनों बाद ब्लॉग पर लौट पाया हूँ ... माफ़ कर दीजियेगा !
आपका नीलेश
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