बहुत दिनों के बाद लिख रहा हूँ ... लिख पा रहा हूँ... इतने दिनों मानस-गुफा में स्वयं को साध रहा था...और स्वयं सध भी रहा था ... समय कठिन था ... कठिनतर था ... कठिनतम था ...पर गुजर गया ... पर उसके साथ ही गुजर गया वो भी ...जन्म दिया जिसने वो कहीं चला गया.... वो चला गया जिसके होने से मेरा होना है ... वो नहीं है फिर भी आज मुझे होना है ... यही जीवन का परम सत्य भी है और चरम अपेक्षा भी!
राम नाम सत्य है ... ये हम आख़िर किससे कहते हैं ? ... किसके लिए कहते हैं?? वो जो निर्जीव है अथवा जो सजीव है? ये प्रश्न अब समझ आया ... और साथ ही उत्तर भी कि ये संदेश है सजीव को ... जीवन को नित्य बनाने का ... बनाये रखने का ... क्योंकि राम तो वही है जो सब में रमा हुआ है ... समाया है ... और जो सब में है ... रहा है ... वो नश्वर कैसे हो सकता है ... इसीलिए वो सत्य है ... चिरंतर है ... निरंतर है ...!! जब इस सत्य को स्मृत रखा जाएगा तो मृत्यु मौत नहीं लगेगी ... जीवन का अंत नही लगेगी .... अनंत लगेगी ... वो जीवन का अन्तिम उत्सव बन जायेगी ... तब हम उसे सहर्ष स्वीकार कर पायेंगे और शांत मन से कह पायेंगे :
जीवन के हर ऋण को चुकाती है...
मृत्यु मुक्ति बन कर आती है !!! ...
आपका नीलेश
मुंबई
Friday, September 25, 2009
Friday, August 28, 2009
गंगा को पाना है ...तो गोमुख जाना ही होगा !
हम समझते हैं कि गंगा को हम हरिद्वार में पा सकते हैं ; प्रयाग की त्रिवेणी में या फिर उससे भी आगे ... गंगा यहाँ एक प्रतीक है - हमारे प्रयासों का। ये खोज - ये गवेषणा किसी की भी हो सकती है ... किसी के लिए भी हो सकती है। मूल बात ये है कि ऐसा समझना अपनी भूल है कि हम किसी को उसके मूल से दूर जाकर पा सकते हैं ... मेरी निगाह में यही 'मूल की भूल' है । इसके लिए ये अपरिहार्य है कि हम धारा के विरुद्ध जाना सीखें। ये कार्य आसान नहीं है ... पहले तो इसको समझना और फिर उस समझ को अमल में लाना क्योंकि ...
धारा के विरुद्ध ही 'तैरना' होता है;
धारा के साथ तो 'बहना' होता है...
बह तो निष्प्राण भी सकते हैं;
परन्तु तैर सिर्फ़ चेतन ही सकते है !
आपका नीलेश
धारा के विरुद्ध ही 'तैरना' होता है;
धारा के साथ तो 'बहना' होता है...
बह तो निष्प्राण भी सकते हैं;
परन्तु तैर सिर्फ़ चेतन ही सकते है !
आपका नीलेश
Tuesday, August 25, 2009
ईश्वर की उपस्थिति में भी महाभारत क्यों?
यदि ऊपरवाले को अंतत: सब कुछ सही ही करना होता है, तो फिर विपत्ति क्योंकर आती है? ये सवाल सब के मन में उठता रहा है। यदि पांडव जीतने ही थे और सब कुछ पूर्व विदित एवं निश्चित ही था... तो फिर महाभारत हुआ ही क्यों? यदि स्वयं कृष्ण वहां उपस्थित थे, तो फिर अर्जुन भटके कैसे ... असमंजस की स्थिति कैसे जन्मी ??? प्रश्न अनेक हैं परन्तु उत्तर एक है कि जब तक परिस्थितियां अपने चरम पर नहीं पहुँच जाती तब तक वो मनोस्थिति बन ही नहीं पाती है कि कोई किसी मूल बात को समझ सके। संभवत: जब भी परिस्थितियां प्रतिकूल बनती हैं तो उन्हें ईश्वरीय विधान मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए ... इस आशा के साथ कि अवश्य ही कुछ अमूल्य -- अभूतपूर्व घटित होने को है... कोई जीवनामृत इन विष-मयी परिस्थितियौं से ... इस गहन मंथन से जन्म लेने वाला है ... क्योंकि ...
द्वंद्व में ही गीता जन्मती है !
आपका neelesh
द्वंद्व में ही गीता जन्मती है !
आपका neelesh
Monday, August 24, 2009
दुख का भविष्य; सुख के भविष्य से अधिक सुखकर होता है!
कुछ दिनों से कुछ लिख नहीं पाया क्योंकि जीवन के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा था । एक तरफ़ जीवन देने वाले का जीवन था, तो दूसरी तरफ़ ईश्वर पर विश्वास की दो तरफा परीक्षा चल रही थी । दो तरफा इसलिए क्योंकि मुझे परीक्षा देनी थी और किसी को अपना सनातन अस्तित्व सिद्ध करना था । आख़िर में दोनों ही सफल रहे। इस समयावधि में कई बार स्वयं को टूटने के कगार पर पाया ... पर हर बार स्वयं को समझाया कि समय अच्छा आएगा... ये तो परिवर्तन का नियम है ...क्योंकि
परिवर्तन ही स्थायी है;शेष तो परिवर्तनशील होता है!
आपका नीलेश
२४-०८-०९
परिवर्तन ही स्थायी है;शेष तो परिवर्तनशील होता है!
आपका नीलेश
२४-०८-०९
Monday, August 10, 2009
एक के प्रति अग्र होना ही ,'एकाग्र' होना है !
सृजनात्मक व्यक्तित्व अक्सर ये अनुभूत करते हैं कि उनकी एकाग्रता का स्तर अपेक्षित स्तर से कम है । वे इसे सृजन के मार्ग में बाधा भी मान लेते हैं। जिसे हम एकाग्रता की न्यूनता मानते हैं, दरअसल वो ही इस ओर एक इशारा है कि हम कुछ नया -- नवीन -- नूतन प्रस्तुत करने जा रहे हैं; चूंकि वो अदृश्य -- अभूतपूर्व निर्माण होता है, इसीलिए वो स्पष्ट नहीं होता है ... और हमे लगता है कि हम एकाग्रता के अभाव में उसे देख नही पा रहे हैं... वो हमे अप्राप्य है । इसीलिए देखा जाए तो एकाग्रता की अपेक्षा इतनी ही होती है कि जब आप कोई कार्य करें तो अपनी समस्त समर्थता का उसमें सम्पूर्ण निवेश कर दें । सत्य तो ये है कि प्रश्न एकाग्रता की कमी का नहीं हैं क्योंकि यदि कोई; कुछ; कैसा भी पूर्व निर्धारित होगा तभी तो ये सम्भव है कि हम उसके प्रति एकाग्र हो पाएं । पूर्व निर्धारित होना तो सृजनात्मक प्रक्रिया में सम्भव नहीं है क्योंकि :
सृजन के प्रमाण नहीं होते !
नीलेश
मुंबई
सृजन के प्रमाण नहीं होते !
नीलेश
मुंबई
... क्या हम आज से पहले भी थे ! ? !
कभी हमें लगता है कि हम आज से पहले भी थे...ज़िन्दगी में कई अघटित बातें भी जानी-पहचानी सी लगती हैं ... कभी कोई अनजाना चेहरा ... कभी कोई जगह ... सब कुछ जैसे कुछ याद दिलाता है । फिर एक अजब सी बेचैनी हमें झकझोरने लगती है । स्वयं पर ही प्रश्न उठने लगते हैं ... हम उठाने लगते हैं ... पर किसके पास है इसका उत्तर! सिर्फ़ वही इसे स्वीकार कर सकते हैं, जो 'आत्मा' में विश्वास करते हैं और मानते हैं कि आत्मा सभी में होती है । जब हम उसके प्रति चेतन हो जाते हैं; तो वो हमारी मार्ग दर्शक बन जाती है, ऐसे व्यक्ति ही 'आत्म चेतन स्वरुप ' होते हैं । तब सद् विचारों को व्यक्ति स्वयं ही पाने लगता है चूंकि ये उस अंतरात्मा की आवाज़ होती है, जो कभी ग़लत मार्ग नहीं दिखाती । ये चेतना की प्रथम अवस्था होती है... जिसमें हम स्वयं को पहचानना सीखते हैं। इसे ही संभवत: 'आत्म साक्षात्कार' की अवस्था कहते हैं। इसी अवस्था में बेचैनी होती है, हम अपने पूर्व जीवन के बारें में जानना चाहते हैं । मान लो हम जान भी जाएँ तो पश्चगमन तो सम्भव नहीं ही है अतः ये स्वीकार कर लेना ही सर्वोचित होगा कि हम एक ऐसी अवस्था को प्राप्त हो गयें है ... जिसमें हमारे पदचिह्न शेष नहीं रहते; रहतें हैं तो सिर्फ़ आगामी मार्ग ... ऐसे मार्ग जिनसे हम उससे ऊपर के चरण में प्रवेश करते हैं ... आत्मा से महात्मा बनने के चरण में। मेरा मानना ये है कि 'महान' वो है जो समकालीन युग की अपेक्षा की पूर्ति करता है; और 'महात्मा' वो है जो सर्वार्थ हेतु युगों से परे -- युगातीत प्रयास करता है और लोगों को आत्मिक विकास के सूत्र प्रदान करता है। इससे परे भी एक परम अवस्था है -- परमात्मा की अवस्था । यहाँ अभी तक के लिए ये प्रश्न उठाना पर्याप्त होगा कि :
यदि महात्मा अपने में पूर्ण होते हैं;
तो फिर परमात्मा क्या और क्यों ?
आपका नीलेश
मुंबई
यदि महात्मा अपने में पूर्ण होते हैं;
तो फिर परमात्मा क्या और क्यों ?
आपका नीलेश
मुंबई
Friday, August 7, 2009
परिभाषा नहीं जानता; परन्तु परिभाषित कर रहा हूँ!
'अपरिग्रह' को आज के सन्दर्भ में कैसे समझ सकते हैं ?
संभवत: इस प्रश्न के प्रश्नकर्ता की अपेक्षा शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं है । शास्त्रीय परिभाषा तो जानना मैं भी नहीं चाहता; परन्तु नये रूप में परिभाषित कर रहा हूँ, इस आशा के साथ कि शायद इस रूप में ये अधिक जीवनोपयोगी हो सके । इस तरह के प्रश्न नवीन सहज एवं सुबोध रूप में ही समझाये जाने की युगीन अपेक्षा रखते है ।
आओ अब समझें ... 'ग्रह' को केन्द्र भी कह सकते हैं; क्योंकि ये गोल होता है और 'परि' को परिधि का संक्षिप्त रूप मान लें । तो बात ये समझ में आ सकती है कि जब हम स्वयं को ही केन्द्र मानकर परिधि खींचना शुरू कर देते हैं, तो हम 'परिग्रही' हो जाते हैं ...तब हम स्वयं से परे नहीं सोच पाते, तब वो परिधि हमे सीमित कर देती है ... अपने तक समेट देती है ... ऐसे में हम स्वार्थी हो जाते हैं ... और तब हम सब अपने लिए ही संचित कर लेना चाहते हैं... संचित करने के प्रयास में हम संकुचित एवं संकीर्ण हो जाते हैं । इससे हम दूसरों को उनके अधिकार से वंचित कर देते हैं और स्वयं के विकास की संभावनाओं को भी संकीर्ण कर देते हैं । इसीलिए यदि हम 'अपरिग्रही' हो जाएँ ... तो हम-सबका विकास सुनिश्चित हो सकता है । इसीलिए ...
ग़लत अपने को केन्द्र मानना नहीं है ...
ग़लत तो है अपने को ही केन्द्र मानकर परिधि खींच लेना ।
आपका नीलेश
मुंबई
संभवत: इस प्रश्न के प्रश्नकर्ता की अपेक्षा शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं है । शास्त्रीय परिभाषा तो जानना मैं भी नहीं चाहता; परन्तु नये रूप में परिभाषित कर रहा हूँ, इस आशा के साथ कि शायद इस रूप में ये अधिक जीवनोपयोगी हो सके । इस तरह के प्रश्न नवीन सहज एवं सुबोध रूप में ही समझाये जाने की युगीन अपेक्षा रखते है ।
आओ अब समझें ... 'ग्रह' को केन्द्र भी कह सकते हैं; क्योंकि ये गोल होता है और 'परि' को परिधि का संक्षिप्त रूप मान लें । तो बात ये समझ में आ सकती है कि जब हम स्वयं को ही केन्द्र मानकर परिधि खींचना शुरू कर देते हैं, तो हम 'परिग्रही' हो जाते हैं ...तब हम स्वयं से परे नहीं सोच पाते, तब वो परिधि हमे सीमित कर देती है ... अपने तक समेट देती है ... ऐसे में हम स्वार्थी हो जाते हैं ... और तब हम सब अपने लिए ही संचित कर लेना चाहते हैं... संचित करने के प्रयास में हम संकुचित एवं संकीर्ण हो जाते हैं । इससे हम दूसरों को उनके अधिकार से वंचित कर देते हैं और स्वयं के विकास की संभावनाओं को भी संकीर्ण कर देते हैं । इसीलिए यदि हम 'अपरिग्रही' हो जाएँ ... तो हम-सबका विकास सुनिश्चित हो सकता है । इसीलिए ...
ग़लत अपने को केन्द्र मानना नहीं है ...
ग़लत तो है अपने को ही केन्द्र मानकर परिधि खींच लेना ।
आपका नीलेश
मुंबई
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